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पाठ 'हिरन का बलिदान' का सारांश निम्नलिखित बिंदुओं में दिया गया है:
- मृग-शावक को पकड़ना: लेखक ने गर्मी की शुरुआत में गंगा तट से एक प्यासे मृग-शावक (हिरन के बच्चे) को पकड़ा। उन्होंने उसका नाम 'चंचल' रखा।
- घर पर पालन-पोषण: चंचल को लेखक की कोठी पर पाला गया, जहाँ वह फल और दूध-रोटी खाकर स्वस्थ हो गया। हालाँकि, धीरे-धीरे वह बहुत शरारती हो गया और घर का सामान (कागज़, कपड़े आदि) खराब करने लगा, जिससे तंग आकर लेखक को उसे वापस जंगल में छोड़ना पड़ा।
- जंगल में वापसी और अलगाव: जब लेखक चंचल को जंगल में छोड़ आया, तो उसने देखा कि अन्य कठोर-हृदय हिरनों ने उसे अपने झुंड में शामिल नहीं किया था। वह पेड़ के नीचे अकेला बैठा रहता था, जबकि उसकी माँ दूर झाड़ियों से उस पर नज़र रखती थी।
- हिरन-मंडली का निरीक्षण: लेखक ने जंगल में एक ऊँचे पेड़ पर मचान बनाया ताकि वह रात में हिरनों की गतिविधियों को देख सके। उन्होंने पाया कि रात में सैकड़ों हिरन एक साथ रेत पर सोते थे, जिसमें बच्चे और माताएँ बीच में और साहसी हिरन रक्षा के लिए चारों तरफ तैनात रहते थे।
- बाघ का हमला: एक रात जब हिरन सो रहे थे, तब एक बाघ ने उनकी ओर बढ़ना शुरू किया। लेखक ने 'क्वाऊ-क्वाऊ' की आवाज़ निकालकर हिरनों को सचेत कर दिया, जिससे पूरी मंडली वहाँ से भाग निकली।
- चंचल का बलिदान: बाघ ने भागती हुई एक हिरनी को अपना लक्ष्य बना लिया और उसे घेर लिया। अपनी माँ को संकट में देखकर चंचल जान-बूझकर बाघ के सामने आ गया और अपने प्राणों की आहुति देकर अपनी माँ की जान बचाई।
इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि पशुओं में भी मनुष्यों की भाँति प्रेम, कर्तव्य और बलिदान की भावनाएँ होती हैं।
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