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अध्याय 'आनंद मठ की ललकार' का मुख्य सारांश निम्नलिखित बिंदुओं में दिया गया है:
- बंकिमचंद्र और मोरेल का संघर्ष: बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय पश्चिम बंगाल के खुलना जिले में डिप्टी मजिस्ट्रेट थे। उनके इलाके में मोरेल नाम का एक अंग्रेज किसानों पर अत्याचार करता था और उन्हें जबरदस्ती नील की खेती करने के लिए मजबूर करता था। बंकिमचंद्र ने कानून का पालन करते हुए उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की, जिससे डरकर मोरेल वहां से भाग खड़ा हुआ।
- गुलामी और स्वतंत्रता पर विचार: इस घटना के बाद बंकिम ने अपने मित्र से चर्चा की कि जब तक भारत अंग्रेजों के अधीन है, भारतीयों को निचले दर्जे का नागरिक ही समझा जाएगा। उन्होंने महसूस किया कि भले ही देश गुलाम हो, लेकिन उनके विचार और उनकी लेखनी (कलम) स्वतंत्र है।
- प्रशासनिक व्यवस्था और अंग्रेजी का प्रभाव: बंकिम ने अनुभव किया कि वे ब्रिटिश शासन के चक्र में मात्र एक 'पेंच' की तरह हैं। हालांकि, अंग्रेजों ने अपने प्रशासन को मजबूत करने के लिए रेल, संचार और अंग्रेजी शिक्षा का विस्तार किया था, लेकिन इस अंग्रेजी भाषा ने अनजाने में ही विभिन्न प्रांतों के भारतीयों को एक-दूसरे से जोड़ने का काम किया।
- 'वंदे मातरम्' का जन्म: 1875 में एक ट्रेन यात्रा के दौरान, भारत की अलौकिक प्राकृतिक सुंदरता (हरीतिमा) को देखकर बंकिम के मन में "वंदे मातरम्" गीत के शब्द आए। उन्होंने महसूस किया कि ये शब्द लोगों की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हैं और आजादी के द्वार खोलने वाली चाबी हैं।
- 'आनंद मठ' उपन्यास की रचना: बंकिम ने इस गीत को जन-जन तक पहुँचाने के लिए 'आनंद मठ' नामक उपन्यास लिखा। यह उपन्यास पहले 'बंगदर्शन' पत्रिका में धारावाहिक के रूप में प्रकाशित हुआ और बाद में एक पुस्तक के रूप में आया।
- स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: 'आनंद मठ' उपन्यास और उसका गीत 'वंदे मातरम्' स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। इस गीत ने लोगों को देश की आजादी के लिए लड़ने और संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
एक सरल उपमा: जैसे एक छोटी सी चाबी एक बहुत बड़े और भारी दरवाजे के ताले को खोल सकती है, वैसे ही बंकिमचंद्र के "वंदे मातरम्" गीत के शब्दों ने गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारत के लिए आजादी का रास्ता खोलने का काम किया।
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