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अध्याय 11, "इस होली पर जलाएँ..." का बिंदुवार सारांश निम्नलिखित है:
- अनोखी पहल: इस पाठ में होली के पारंपरिक उत्सव को एक नया और सार्थक रूप दिया गया है। मोहल्ले के बच्चे और 'भाई साहब' मिलकर होलिका दहन के साथ-साथ अपने मन की बुराइयों और कचरे को जलाने का संकल्प लेते हैं।
- मुख्य पात्र: इस कार्यक्रम के मुख्य पात्र 'भाई साहब' (20 वर्ष), मोहल्ले के बच्चे (तन्मय, पंखुड़ी, कुनिका, प्रलेख, मालवी और शलभ) तथा मुख्य अतिथि के रूप में नेता मनदीप सिंह जी हैं।
- बुराइयों की आहुति: कार्यक्रम के दौरान सभी पात्र एक-एक करके अपने भीतर के किसी एक दुर्गुण (बुरी आदत) को बैनर या तख्ती के रूप में अग्नि को समर्पित करते हैं:
- भाई साहब: उन्होंने अपने 'आलस्य' की आहुति दी, जिसके कारण अक्सर उनकी ट्रेन छूट जाती थी।
- पंखुड़ी: उन्होंने अपने 'बातूनी' स्वभाव को छोड़ने का निर्णय लिया क्योंकि इससे समय और शक्ति बर्बाद होती थी।
- प्रलेख: टीवी देखते और पढ़ते समय लगातार खाते रहने की आदत यानी 'खाऊ-पीऊ' वाले स्वभाव को त्याग दिया।
- मालवी: उन्होंने अपने 'चिड़चिड़ेपन' और बात-बात पर गुस्सा होने की आदत पर नियंत्रण पाने का संकल्प लिया।
- कुनिका: उन्होंने स्वच्छता की कमी यानी कहीं भी कचरा फेंकने की अपनी बुरी आदत को त्यागने का वादा किया।
- तन्मय: दूसरों को नीचा दिखाने वाली 'चुगलखोरी' की आदत को अग्नि के हवाले किया।
- शलभ: उन्होंने अपने 'डरपोक' स्वभाव और परीक्षा व गणित के डर पर विजय पाने का संकल्प लिया।
- मुख्य अतिथि का हृदय परिवर्तन: बच्चों के इस अनूठे प्रयास से प्रेरित होकर मुख्य अतिथि नेता मनदीप सिंह ने भी राजनीति में किए जाने वाले 'झूठे आश्वासनों' के दुर्गुण को त्यागने का साहस दिखाया।
- सीख और संदेश: पाठ के अंत में 'एक पंथ दो काज' की लोकोक्ति के माध्यम से संदेश दिया गया है कि त्योहार मनाने के साथ-साथ मन की शुद्धि (साफ-सफाई) करना भी अत्यंत आवश्यक है। यह अध्याय हमें भाईचारा और सद्गुणों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
एक सरल उपमा: जैसे हम दिवाली पर अपने घर के कोनों की सफाई करके कूड़ा बाहर निकालते हैं, वैसे ही इस पाठ में होली के माध्यम से मन के कोनों में छिपे 'स्वभावगत कूड़े' (बुराइयों) को जलाकर जीवन को स्वच्छ बनाने की बात कही गई है।
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