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यह अध्याय 'वसंत के दोहे' प्रकृति के सुंदर चित्रण और वसंत ऋतु के आगमन से होने वाले परिवर्तनों पर आधारित है। स्रोतों के आधार पर इस अध्याय का बिंदुवार सारांश निम्नलिखित है:

  • वसंत का आगमन और प्रकृति: वसंत ऋतु (मधुमास) के आते ही धरती पर चारों ओर खुशहाली छा जाती है। भँवरे कोमल कलियों के पास मँडराने लगते हैं और मंद हवा के साथ फूलों की सुगंध और मकरंद (पराग) कण-कण में बिखर जाता है।
  • पक्षियों का उल्लास: वसंत में पक्षी अत्यंत प्रसन्न दिखाई देते हैं। कोयल आम की डाल पर बैठकर मधुर गीत गाती है, तो पपीहा विरह का संगीत छेड़ता है। अन्य पक्षी भी अपनी चोंच उठाकर मधुर गान गाते हैं।
  • वनस्पति में परिवर्तन: इस मौसम में पेड़ नए पत्तों (नव पल्लव) रूपी वस्त्र पहनकर प्रफुल्लित हो जाते हैं। प्रकृति के कण-कण में वसंत का अनुराग (प्रेम) और नया पुष्प-पराग झरता हुआ प्रतीत होता है।
  • धरती का श्रृंगार: कवि के अनुसार, वसंत में धरती ने मानो हरे रंग की चुनरी ओढ़ ली है। प्रकृति की इस सुंदरता को देखकर मन ही मन विविध सुरीले साज बजने लगते हैं।
  • भाषा और व्याकरण का ज्ञान: पाठ में विद्यार्थियों को भाषा की समझ बढ़ाने के लिए तत्सम-तद्भव शब्द (जैसे: आम्र-आम, पक्षी-पंछी), पर्यायवाची, प्रत्यय अलग करना, लिंग पहचानना और समास (जैसे: नवपल्लव, मधुमास) का अभ्यास कराया गया है।
  • सीख और मूल्य: इस अध्याय से यह सीख मिलती है कि वसंत ऋतु प्रकृति को रंग-बिरंगे फूलों और सुगंध से भर देती है, जिससे कोमल भावनाओं का विकास होता है और प्रकृति के सौंदर्य में वृद्धि होती है।
  • अतिरिक्त पठन (कली और फूल): अध्याय के अंत में एक प्रेरणादायक कविता दी गई है जो सिखाती है कि जीवन की सार्थकता स्वयं को संचित करने में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीने और अपनी खुशबू (खुशियाँ) बाँटने में है।

प्रकृति का यह परिवर्तन एक ऐसे उत्सव की तरह है जहाँ पूरी धरती नए वस्त्र पहनकर संगीत और सुगंध के साथ झूम उठती है।

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