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पाठ 10, 'समाधि', कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित है। इस अध्याय का बिंदुवार सारांश निम्नलिखित है:

  • विषय-वस्तु: यह कविता झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की समाधि को समर्पित है, जो उनके साहस और बलिदान का प्रतीक है।
  • समाधि का महत्व: इस लघु समाधि में रानी की राख की ढेरी संचित है। कवयित्री इसे एक 'स्मृतिशाला' मानती हैं जहाँ रानी ने स्वयं को समर्पित कर स्वतंत्रता की दिव्य आरती उतारी थी।
  • वीरता और बलिदान: रानी ने युद्ध के मैदान में अंत तक शत्रुओं के प्रहार सहे और एक वीर बाला की तरह अपनी आहुति दी। उनके इस बलिदान से उनका मान और भी बढ़ गया है, क्योंकि रण में बलि होने से वीर का मूल्य वैसे ही बढ़ जाता है जैसे सोने से अधिक उसकी भस्म मूल्यवान होती है।
  • स्वतंत्रता की आशा: यह समाधि कवयित्री को रानी से भी अधिक प्रिय है क्योंकि यहाँ स्वतंत्रता की आशा की चिंगारी छिपी हुई है, जो भविष्य के संघर्षों के लिए प्रेरणा देती है।
  • अन्य समाधियों से तुलना: संसार में और भी कई सुंदर समाधियाँ हैं, लेकिन वहाँ रात में केवल तुच्छ जंतु ही बोलते हैं। इसके विपरीत, रानी की समाधि की अमर कहानी कवियों की वाणी में स्नेह और श्रद्धा के साथ गाई जाती है।
  • लोक गाथा: बुंदेलखंड के लोक गायकों (हरबोलों) के मुख से आज भी रानी की वीरता की कहानी सुनी जाती है कि वे किस प्रकार 'मर्दानी' बनकर शत्रुओं से खूब लड़ी थीं।
  • विशेष शब्दावली: पाठ में रानी के लिए 'मर्दानी' शब्द का प्रयोग उनके पुरुषोचित साहस और वीरता के कारण किया गया है। समाधि को 'चिर समाधि' इसलिए कहा गया है क्योंकि यह रानी की स्थायी और अमर स्मृति है।
  • शिक्षण उद्देश्य: इस पाठ के माध्यम से विद्यार्थियों में देशप्रेम, शहीदों के प्रति सम्मान और महिला सशक्तिकरण जैसे गुणों को विकसित करने का प्रयास किया गया है।
  • अतिरिक्त पठन: अध्याय के अंत में 'परंपरागत खेल' शीर्षक से एक कविता दी गई है, जो खो-खो, कबड्डी, गिल्ली-डंडा और कुश्ती जैसे भारतीय खेलों के आपसी मेलजोल और आनंद को दर्शाती है।

साधारण शब्दों में: रानी लक्ष्मीबाई की यह समाधि केवल पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि वह दीपक है जिसकी लौ से पूरे देश में देशभक्ति की रोशनी फैलती है।

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