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पाठ 'सज़ा' (कुंदनिका कापड़िया द्वारा लिखित) का बिंदुवार सारांश निम्नलिखित है:

  • गाँव वापसी और बचपन की यादें: कहानी का नायक, विजय, कई वर्षों के बाद अपने गाँव लौटता है। गाँव की प्राकृतिक सुंदरता और हरियाली को देखकर उसे अपने बचपन के दिन और स्कूल के शिक्षक याद आते हैं।
  • गणित की परीक्षा और अपराध: विजय याद करता है कि बचपन में उसने अपने गणित के अध्यापक के साथ एक अन्याय किया था। गणित की परीक्षा की तैयारी न होने के कारण जब वह सवाल हल नहीं कर पाया, तो उसे अपनी बेइज्जती महसूस हुई।
  • पिता की शक्ति का दुरुपयोग: विजय के पिता एक प्रतिष्ठित वकील और स्कूल की प्रबंधकारिणी समिति के सदस्य थे। उन्होंने अपनी शक्ति और प्रतिष्ठा के बल पर उस निर्दोष अध्यापक को स्कूल से निकलवा दिया था,।
  • पश्चाताप का अहसास: वर्षों बाद जब विजय एक कंपनी में मैनेजर बनता है और उसका एक मातहत कर्मचारी उसके खिलाफ झूठी शिकायत करता है, तब उसे अपने पुराने किए पर गहरा दुख और क्षोभ होता है। उसे अपने गणित वाले अध्यापक की याद आती है।
  • अध्यापक की खोज: विजय अपने पाप का प्रायश्चित करने और अध्यापक से माफी माँगने के लिए उनके पुराने घर पहुँचता है। वह उन्हें समुद्र के किनारे टहलते हुए पाता है।
  • पहचान की कमी: विजय अपना पूरा नाम बताकर उन्हें पुरानी बातें याद दिलाने की कोशिश करता है ताकि वह उनसे क्षमा माँग सके। लेकिन वृद्ध अध्यापक उसे पहचान नहीं पाते और कहते हैं कि उम्र के कारण वे बहुत कुछ भूल गए हैं।
  • असली सज़ा: विजय को महसूस होता है कि सफलता, धन और प्रतिष्ठा से भी बढ़कर उत्तम वस्तुएँ जीवन में होती हैं। वह इस बात से बहुत उदास हो जाता है कि जिस व्यक्ति से वह माफी माँगना चाहता है, उसकी स्मृति में उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है
  • निष्कर्ष: कहानी के अंत में विजय यह समझता है कि एक सज्जन और सच्चे इंसान की यादों से पूरी तरह मिट जाना ही उसके लिए सबसे बड़ी 'सज़ा' है।

संक्षेप में, यह कहानी हमें सिखाती है कि हमारे द्वारा किए गए नियमों के उल्लंघन और दूसरों के प्रति किए गए अन्याय का पश्चाताप करना ही अनुशासन का हिस्सा है, लेकिन कभी-कभी माफी का अवसर भी हाथ से निकल जाता है।

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