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पाठ 'एक तस्वीर के दो पहलू' का बिंदुवार सारांश निम्नलिखित है:
- लेखक का स्वभाव: लेखक स्वयं को एक 'जंगली नागरिक' मानते हैं जिन्हें नगरों में रहने के बावजूद असली आनंद जंगलों, पर्वतों और प्रकृति के साथ समय बिताने में मिलता है।
- बंदरों के बाग का दृश्य: एक बार लेखक बंदरों के एक बाग में पहुँचे जहाँ बंदर पूरी तरह स्वतंत्र थे। वहाँ का वातावरण प्रेम और सरलता से भरा था, और बंदर मनुष्यों से डरे हुए नहीं थे।
- स्वतंत्र बंदरों की क्रीड़ा: लेखक ने देखा कि छोटे बंदर आपस में शरारत और प्यार से खेल रहे थे। एक माँ अपने बच्चों को सुलाने का धैर्यपूर्वक प्रयास कर रही थी, और अत्यधिक व्यस्त होने के बाद भी उसके चेहरे पर कोई झुँझलाहट नहीं थी।
- कैद बंदरों का सामना: जब लेखक घर लौट रहे थे, तो उन्होंने एक जालीदार गाड़ी में ५०-६० कैद बंदरों को देखा जिन्हें सुंदरपुर से पकड़कर हरिद्वार ले जाया जा रहा था। वे बंदर बहुत ही क्रोधित, घायल और हिंसक दिखाई दे रहे थे।
- ममता का अंत: गाड़ी के भीतर लेखक ने एक हृदयविदारक दृश्य देखा, जहाँ भूख से व्याकुल एक बच्चा जब अपनी माँ की गोद की ओर बढ़ा, तो माँ ने ममता दिखाने के बजाय उसे बेरहमी से नोचना शुरू कर दिया।
- स्वतंत्रता बनाम परतंत्रता: लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि ये एक ही जीव के दो बिल्कुल अलग पहलू हैं। स्वतंत्रता प्राणी में दया, करुणा और प्रेम भरती है, जबकि परतंत्रता (कैद) उसे क्रूर, हृदयहीन और आक्रामक बना देती है।
- मुख्य संदेश: स्वतंत्रता हर प्राणी का जन्मसिद्ध अधिकार है क्योंकि स्वतंत्र जीवन ही गुणों से पूरित होता है।
एक सरल उदाहरण: इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि जैसे एक खुला पक्षी आकाश में चहचहाता है और खुशी से उड़ता है, लेकिन वही पक्षी जब पिंजरे में बंद कर दिया जाता है, तो वह अपनी मधुर आवाज़ भूलकर पिंजरे की तीलियों पर अपनी चोंच मारने लगता है। आज़ादी जीवन की सुंदरता है और गुलामी उसका अंधकार।
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