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'हिमांशु जोशी' द्वारा लिखित कहानी 'रथचक्र' का बिंदुवार सारांश निम्नलिखित है:
- अतीत की स्मृतियाँ: लेखक वर्षों बाद अपने घर वापस आता है और अपने पिता की असामयिक मृत्यु तथा उसके बाद परिवार द्वारा झेले गए दुखों को याद करता है। पिता की मृत्यु के बाद सगे-संबंधियों ने सहायता करने के बजाय उनके व्यापार का अनुचित लाभ उठाया था।
- बड़े भैया का त्याग और संकल्प: दादाजी (बाबा) के बूढ़े होने और दुकान की स्थिति बिगड़ने पर बड़े भैया ने अल्मोड़ा जाकर पढ़ने का निर्णय लिया ताकि वे भविष्य में परिवार को संभाल सकें। उन्होंने छोटे भाई 'जीतू' (लेखक) को स्कूल के साथ-साथ घर और दुकान की जिम्मेदारी संभालने के लिए प्रेरित किया।
- सफलता और प्रगति: बड़े भैया ने परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिससे बाबा बहुत प्रसन्न हुए। बाद में बड़े भैया फ़ौज में भर्ती हो गए और लेखक को दिल्ली में नौकरी मिल गई।
- पारिवारिक परिवर्तन: इसी बीच बाबा का स्वर्गवास हो गया और माँ घर में अकेली रह गईं। बड़े भैया ने एक सैन्य अफ़सर की बेटी से विवाह किया, जो केरल की रहने वाली थीं, परंतु वे पहाड़ों के कठिन जीवन में तालमेल नहीं बिठा पाईं।
- युद्ध और शहादत: पाकिस्तान के साथ युद्ध (बांग्लादेश मोर्चा) शुरू होने पर बड़े भैया (मेजर तपनकुमार) मोर्चे पर चले गए। युद्ध पर जाने से पहले वे लेखक से मिले और अपनी बहुमूल्य घड़ी उसे भेंट कर दी। ढाका के पास मोर्चे पर लड़ते हुए वे वीरगति को प्राप्त हो गए।
- उत्तरदायित्व का हस्तांतरण: भैया की मृत्यु के बाद लेखक अपनी भाभी और बच्चों को घर ले आया। कहानी के अंत में लेखक देखता है कि जो पेड़ बाबा और भैया ने लगाए थे, वे अब बड़े हो गए हैं और अब नई पौध रोपने की जिम्मेदारी लेखक पर है।
- शीर्षक की सार्थकता: 'रथचक्र' का अर्थ है जीवन का घूमता पहिया या जीवन-चक्र। यह कहानी दर्शाती है कि परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं और एक पीढ़ी के जाने के बाद अगली पीढ़ी को परिवार और समाज की जिम्मेदारियों को संभालना पड़ता है।
उपमा: जीवन का यह चक्र एक बगीचे की तरह है, जहाँ पुराने माली के जाने के बाद नए माली को पौधों की देखभाल और नए बीज रोपने की जिम्मेदारी उठानी ही पड़ती है ताकि हरियाली बनी रहे।
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