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अध्याय 16, "पुनः नया निर्माण करो", द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी द्वारा रचित एक प्रेरणादायक कविता है। इस अध्याय का सारांश निम्नलिखित बिंदुओं में दिया गया है:
- नवनिर्माण का आह्वान: कवि धरती के 'अमर सपूतों' को संबोधित करते हुए उन्हें उठने और देश का पुनः नया निर्माण करने के लिए प्रेरित करते हैं।
- नई स्फूर्ति और प्राण: कवि का उद्देश्य जन-जन के जीवन में फिर से नई स्फूर्ति, नव प्राण, नई उमंगें, नई तरंगें और नई आशाएँ भरना है।
- निराशा को दूर करना: युगों-युगों से मुरझाए हुए लोगों (सुमनो) के चेहरों पर नई मुस्कान लाने की बात कही गई है, ताकि समाज में व्याप्त निराशा खत्म हो सके।
- प्रकृति से प्रेरणा: कविता में बताया गया है कि हर सुबह एक नयी किरण और नयी ज्योति लेकर आती है। जैसे प्रकृति में कलियाँ खिल रही हैं और फूल मुस्कुरा रहे हैं, वैसे ही मनुष्य को भी खिलना चाहिए।
- धरती माँ का स्वरूप: कवि के अनुसार, आज धरती माँ की काया सुनहरी हो रही है, जो विकास और सुनहरे भविष्य का प्रतीक है।
- संसार रूपी उद्यान: कवि चाहते हैं कि अपनी नूतन मंगलमयी ध्वनियों से इस संसार रूपी बगीचे (जग-उद्यान) को गुंजित किया जाए।
- नैतिक और व्याकरणिक शिक्षा: इस अध्याय के माध्यम से विद्यार्थियों को देशप्रेम, सकारात्मकता और आशावान बनने की सीख दी गई है। साथ ही, इसमें भाषा-ज्ञान के अंतर्गत पर्यायवाची, विलोम, लिंग, वचन और व्याकरण की विभिन्न परिभाषाओं (जैसे संज्ञा, सर्वनाम, संधि आदि) का अभ्यास कराया गया है।
- सामूहिक प्रयास का महत्व: अध्याय यह संदेश देता है कि जब सब मिलकर कोई कार्य करते हैं, तो असंभव कार्य भी संभव हो जाता है।
संक्षेप में, यह अध्याय युवा पीढ़ी को अपनी सुस्ती त्यागकर राष्ट्र के विकास में नई ऊर्जा के साथ जुटने का संदेश देता है।
जिस प्रकार एक माली पतझड़ के बाद अपने बगीचे के हर मुरझाए पौधे को सींचकर उसे फिर से हरा-भरा बनाता है, उसी प्रकार कवि युवाओं से देश के हर नागरिक के जीवन में खुशहाली और नई उम्मीदें भरने की अपेक्षा करते हैं।
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