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प्रेमचंद - बड़े भाई साहब
पाठ परिचय
यह कहानी मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई है। इसमें दो भाइयों के रिश्तों, उनकी पढ़ाई के तौर-तरीकों और जीवन के अनुभव के महत्व को बहुत ही सुंदर ढंग से दर्शाया गया है। कहानी का मुख्य स्वर व्यंग्यात्मक और उपदेशात्मक है।
1. दोनों भाइयों का परिचय और स्वभाव
- उम्र और दर्जे का अंतर: लेखक (छोटा भाई) 9 साल का था और बड़ा भाई 14 साल का। दोनों की उम्र में 5 साल का अंतर था, लेकिन पढ़ाई में केवल 3 कक्षाओं का अंतर था।
- भाई साहब का अध्ययनशील स्वभाव: बड़े भाई साहब हर समय पढ़ते रहते थे। वे एक कक्षा पास करने में दो-तीन साल लगाते थे क्योंकि उनका मानना था कि 'बुनियाद' मजबूत होनी चाहिए। वे अक्सर कॉपी-किताबों के हाशियों पर कुत्ते-बिल्लियों और बेमतलब शब्दों के चित्र बनाया करते थे।
- लेखक की खेलकूद में रुचि: छोटे भाई का मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था। मौका मिलते ही वह हॉस्टल से निकलकर मैदान में खेलने (कंकड़ियाँ उछालने, पतंग उड़ाने, चारदीवारी पर चढ़ने) चला जाता था।
2. भाई साहब का अनुशासन और लेखक का टाइम-टेबल
- डांट-फटकार: जब भी लेखक खेल कर लौटता, भाई साहब का रौद्र रूप और एक ही सवाल होता- "कहाँ थे?"। वे लेखक को अंग्रेजी की कठिनाई और पढ़ाई की गंभीरता पर लंबा भाषण देते थे।
- निराशा और टाइम-टेबल: भाई साहब के उपदेश सुनकर लेखक रोने लगता और निराशा में पढ़ाई का एक सख्त 'टाइम-टेबल' बना लेता।
- टाइम-टेबल की विफलता: टाइम-टेबल बनाना आसान था पर उस पर अमल करना मुश्किल। मैदान की हरियाली और खेल का आकर्षण लेखक को टाइम-टेबल भूलने पर मजबूर कर देता था।
3. सालाना इम्तिहान और परिणाम
- पहला परिणाम: सालाना परीक्षा में बड़े भाई साहब फेल हो गए और लेखक अपनी कक्षा में प्रथम आया। अब दोनों के बीच केवल दो साल का अंतर रह गया।
- घमंड और रावण का उदाहरण: लेखक के मन में थोड़ा अभिमान आ गया। इस पर भाई साहब ने उसे 'रावण', 'शैतान' और 'शाहेरूम' का उदाहरण देते हुए समझाया कि घमंड बड़े-बड़ों का नहीं रहा। उन्होंने बताया कि असली चुनौती अगली कक्षाओं (ज्यामिति, इतिहास) में होगी।
- दूसरा परिणाम: संयोग से अगले साल फिर वही हुआ। भाई साहब कठिन परिश्रम के बाद भी फेल हो गए और लेखक कम पढ़कर भी अव्वल आ गया। अब दोनों में सिर्फ एक दर्जे का अंतर रह गया।
4. लेखक की स्वच्छंदता और पतंगबाजी
- भाई साहब के बार-बार फेल होने से उनका रोब थोड़ा कम हो गया था।
- लेखक अब निडर होकर पतंगबाजी (कनकौए उड़ाने) में अपना सारा समय बिताने लगा।
- लेखक यह सब गुप्त रूप से करता था ताकि भाई साहब को यह न लगे कि उनका सम्मान कम हो गया है।
5. बाजार में मुठभेड़ और भाई साहब का अंतिम उपदेश
- एक दिन लेखक बाजार में पतंग लूटने के लिए दौड़ रहा था, तभी भाई साहब ने उसे पकड़ लिया।
- पद और मर्यादा: उन्होंने लेखक को डांटा कि अब वह आठवीं कक्षा में है, उसे अपनी 'पोजीशन' का ख्याल रखना चाहिए।
- किताबी ज्ञान बनाम जीवन का अनुभव: भाई साहब ने तर्क दिया कि भले ही तुम मेरी कक्षा में आ जाओ या मुझसे आगे निकल जाओ, लेकिन "मुझमें और तुममें जो पाँच साल का अंतर है, उसे खुदा भी नहीं मिटा सकता।"
- अम्मा और दादा का उदाहरण: उन्होंने समझाया कि समझ केवल किताबें पढ़ने से नहीं, दुनिया देखने से आती है। अम्मा और दादा भले ही पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उन्हें जीवन और घर चलाने का अनुभव हमसे कहीं ज्यादा था। बीमारी या मुसीबत में किताबी ज्ञान काम नहीं आता, अनुभव काम आता है।
6. निष्कर्ष और हृदय परिवर्तन
- भाई साहब की बातें सुनकर लेखक की आँखों में आँसू आ गए और उसे अपनी लघुता (छोटेपन) का अनुभव हुआ।
- लेखक ने स्वीकार किया कि भाई साहब को उसे डांटने का पूरा हक है।
- भाई साहब का बप्पन: अंत में भाई साहब ने लेखक को गले लगा लिया और कहा कि उनका भी मन पतंग उड़ाने का करता है, लेकिन अगर वे खुद ही 'बेराह' चलेंगे तो छोटे भाई की रक्षा कैसे करेंगे?
- तभी एक कटी हुई पतंग गुजरी। भाई साहब ने अपनी लम्बाई का फायदा उठाकर उसकी डोर पकड़ ली और हॉस्टल की तरफ दौड़ पड़े, लेखक भी उनके पीछे दौड़ पड़ा।
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