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तोप
कवि: वीरेन डंगवाल
1. कवि परिचय (Author Introduction)
- नाम: वीरेन डंगवाल (जन्म: 5 अगस्त 1947, कीर्तिनगर, उत्तराखंड - मृत्यु: 28 सितंबर 2015)।
- विशेषता: वे समाज के साधारण जन और हाशिए पर स्थित जीवन के विलक्षण ब्योरों को अपनी कविताओं में उकेरते थे।
- सम्मान: उन्हें श्रीकांत वर्मा पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
2. पाठ प्रवेश और संदर्भ (Context)
- प्रतीक और धरोहर: हमारे पास दो प्रकार की धरोहरें होती हैं—एक वे जो हमें प्राचीन उपलब्धियों पर गर्व करना सिखाती हैं, और दूसरी वे जो हमें अतीत की गलतियों और दमन की याद दिलाती हैं।
- ईस्ट इंडिया कंपनी: यह पाठ हमें याद दिलाता है कि कैसे ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने आई थी, लेकिन धीरे-धीरे शासक बन बैठी। उन्होंने यहाँ बाग भी बनवाए और तोपें भी तैयार कीं।
- उद्देश्य: यह कविता उस समय की याद दिलाती है जब कंपनी की तोपों ने भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का दमन किया था, ताकि हम भविष्य में सावधान रहें।
3. कविता का विस्तृत सारांश (Detailed Summary)
क. कंपनी बाग की तोप
- कविता की शुरुआत 1857 की एक तोप के वर्णन से होती है, जो 'कंपनी बाग' (ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा बनवाए गए बाग) के मुख्य द्वार (मुहाने) पर रखी गई है।
- इस तोप की बहुत देखभाल की जाती है। जिस प्रकार यह कंपनी बाग हमें विरासत में मिला है, वैसे ही यह तोप भी मिली है।
- इसे साल में दो बार (स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसरों पर) खूब चमकाया जाता है।
ख. अतीत का गौरव और क्रूरता
- सुबह और शाम को जब सैलानी (पर्यटक) कंपनी बाग में घूमने आते हैं, तो यह तोप उन्हें अपने इतिहास के बारे में बताती है।
- यह बताती है कि अपने जमाने में वह बहुत जबरदस्त और शक्तिशाली थी।
- उसने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बड़े-बड़े शूरवीरों (योद्धाओं) के धज्जे उड़ा दिए थे (उन्हें मार गिराया था)।
ग. वर्तमान स्थिति: बच्चों और चिड़ियों का खेल
- आज उस भयानक तोप की स्थिति बदल गई है। अब वह केवल एक प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह गई है।
- अब छोटे बच्चे उस पर बैठकर घुड़सवारी का खेल खेलते हैं।
- जब बच्चे नहीं होते, तो चिड़िया (अक्सर गौरैया) उस पर बैठकर आपस में गपशप करती हैं।
- कभी-कभी शरारती चिड़िया उस तोप के मुँह (बैरल) के भीतर भी घुस जाती हैं।
4. कविता का मुख्य संदेश (Core Message)
चिड़ियों का तोप के मुँह में घुसना एक बहुत बड़ी बात का प्रतीक है। यह दृश्य हमें बताता है कि:
"चाहे कोई तोप (शक्ति या सत्ता) कितनी भी बड़ी और विनाशकारी क्यों न हो, एक न एक दिन उसका मुँह बंद हो ही जाता है।"
अंततः, हिंसा और दमन पर शांति और मासूमियत की विजय होती है। यह तोप अब शांत है और बच्चे व पक्षी निडर होकर उस पर खेलते हैं।
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