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रवींद्र केलेकर - पतझर में टूटी पत्तियाँ
परिचय: इस पाठ में लेखक रवींद्र केलेकर ने दो अलग-अलग प्रसंगों के माध्यम से जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों को उजागर किया है। पहला प्रसंग 'गिन्नी का सोना' आदर्शवाद बनाम व्यवहारवाद पर केंद्रित है, जबकि दूसरा प्रसंग 'झेन की देन' मानसिक शांति और वर्तमान में जीने की कला सिखाता है।
(I) गिन्नी का सोना (आदर्श और व्यवहारिकता)
- शुद्ध सोना बनाम गिन्नी का सोना: लेखक बताते हैं कि शुद्ध सोना और गिन्नी का सोना अलग होता है। गिन्नी के सोने में थोड़ा तांबा मिलाया जाता है, जिससे वह ज्यादा चमकदार और मजबूत हो जाता है। इसी से आभूषण बनते हैं।
- प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट (व्यावहारिक आदर्शवादी): जिस तरह सोने में तांबा मिलाकर उसे मजबूत बनाया जाता है, उसी तरह कुछ लोग अपने आदर्शों (Ideals) में व्यावहारिकता (Practicality) मिला देते हैं। ऐसे लोगों को ही 'प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट' कहा जाता है।
- व्यावहारिकता का प्रभाव: जब समाज में व्यावहारिकता का गुणगान होने लगता है, तो आदर्श धीरे-धीरे पीछे छूट जाते हैं। केवल व्यावहारिक सूझ-बूझ ही आगे रहती है। इसे लेखक 'सोने का पीछे रहना और तांबे का आगे आना' कहते हैं।
- गांधीजी का उदाहरण: लोग महात्मा गांधी को भी 'प्रैक्टिकल आइडियालिस्ट' कहते थे। वे व्यावहारिकता की कीमत जानते थे, लेकिन वे कभी आदर्शों को नीचे नहीं गिरने देते थे। इसके विपरीत, वे व्यावहारिकता को आदर्शों के स्तर तक ऊपर उठाते थे। वे 'तांबे में सोना' नहीं, बल्कि 'सोने में तांबा' मिलाते थे।
- शाश्वत मूल्य: व्यावहारिक लोग केवल अपना लाभ-हानि देखते हैं और खुद तरक्की करते हैं। लेकिन जो लोग खुद ऊपर उठने के साथ-साथ दूसरों को भी ऊपर उठाते हैं, वे ही आदर्शवादी होते हैं। समाज को जो शाश्वत मूल्य (Eternal Values) मिले हैं, वे आदर्शवादी लोगों की ही देन हैं, न कि व्यावहारिक लोगों की।
(II) झेन की देन (मानसिक शांति और वर्तमान)
- जापान में मानसिक तनाव: लेखक ने जापान में अपने मित्र से पूछा कि वहाँ कौन सी बीमारियाँ अधिक हैं। मित्र ने बताया कि 80% लोग मानसिक रोगी (मनोरुग्ण) हैं।
- जीवन की रफ्तार: मानसिक तनाव का मुख्य कारण जापान में जीवन की तेज रफ्तार है। वहाँ लोग चलते नहीं, दौड़ते हैं; बोलते नहीं, बकते हैं। अमेरिका से प्रतिस्पर्धा करने के चक्कर में वे एक महीने का काम एक दिन में करना चाहते हैं। इससे दिमाग का 'इंजन' टूट जाता है।
- टी-सेरेमनी (चा-नो-यू): मानसिक शांति के लिए लेखक को एक 'टी-सेरेमनी' में ले जाया गया। यह चाय पीने की एक विशेष जापानी विधि है। यह आयोजन एक छह मंजिला इमारत की छत पर बनी पर्णकुटी (पत्तों की कुटिया) में हुआ, जहाँ अत्यंत शांति थी।
- गरिमापूर्ण वातावरण: चाय पिलाने वाले (चाजीन) ने बहुत ही सलीके और गरिमा के साथ स्वागत किया। वहाँ का वातावरण इतना शांत था कि चायदानी में पानी के उबलने (खदबदाने) की आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी। वहाँ केवल तीन लोगों को प्रवेश की अनुमति थी।
- वर्तमान में जीना: प्याले में दो घूंट चाय थी, जिसे पीने में करीब डेढ़ घंटा लगाया गया। चाय पीते-पीते लेखक का दिमाग शांत हो गया और रफ़्तार धीमी पड़ गई। उन्हें लगा कि भूतकाल (Past) और भविष्यकाल (Future) दोनों मिट गए हैं और केवल वर्तमान क्षण (Present Moment) ही सत्य है।
- निष्कर्ष: लेखक को अनुभव हुआ कि हम अक्सर या तो बीती यादों में रहते हैं या भविष्य के सपनों में। ये दोनों ही मिथ्या हैं। जो पल हमारे सामने है, वही सत्य है। जीना इसी को कहते हैं। यह 'जीने की कला' जापानियों को झेन परंपरा की देन है।
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