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कैफ़ी आज़मी - कर चले हम फ़िदा
लेखक: कैफ़ी आज़मी
यह कविता युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म 'हकीकत' के लिए लिखी गई थी। इसमें एक सैनिक के हृदय की आवाज़ और देशवासियों के लिए उसके अंतिम संदेश का मार्मिक चित्रण है।
पाठ का विस्तृत बिंदुवार सारांश
- 1. सैनिकों का अंतिम बलिदान और देशवासियों को संदेश सैनिक देश की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर रहे हैं। वे कहते हैं कि "हम तो अपनी जान देश पर कुर्बान करके जा रहे हैं, अब यह देश तुम्हारे (देशवासियों के) हवाले है।" यह पंक्ति सैनिकों की निस्वार्थ भावना और देश के प्रति उनके समर्पण को दर्शाती है।
- 2. विषम परिस्थितियों में भी अदम्य साहस सैनिक बताते हैं कि युद्ध के मैदान में साँसें थम रही थीं और ठंड से नब्ज़ जम रही थी, फिर भी उन्होंने अपने बढ़ते कदमों को रुकने नहीं दिया। उन्होंने अपने सिर कटवा दिए (प्राण दे दिए), लेकिन हिमालय का सिर नहीं झुकने दिया। अर्थात, उन्होंने भारत के सम्मान और सीमाओं की रक्षा अंतिम साँस तक की।
- 3. जवानी और प्रेम की सार्थकता कवि के अनुसार, जिंदा रहने के अवसर तो जीवन में बहुत मिलते हैं, लेकिन देश के लिए जान देने का मौका (रुत) कभी-कभी ही आता है। वह जवानी व्यर्थ है जो अपने खून से देश की रक्षा न करे। सच्चा प्रेम और सौंदर्य वही है जो देश के काम आए।
- 4. धरती बनी दुल्हन और कुर्बानियों का सिलसिला सैनिकों के खून से सनी हुई धरती ऐसी लग रही है मानो उसने लाल जोड़ा पहन लिया हो और वह दुल्हन बन गई हो। सैनिक कहते हैं कि उनके जाने के बाद भी कुर्बानियों का रास्ता सूना नहीं होना चाहिए। देश की रक्षा के लिए सैनिकों के नए काफिले (समूह) तैयार रहने चाहिए। जीत का जश्न मनाने से पहले, यह बलिदान का जश्न मनाने का समय है।
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5. सिर पर कफन बांधना और ऐतिहासिक प्रतीक
सैनिक अपने साथियों से "सिर पर कफन बांधने" (मृत्यु के लिए तैयार रहने) को कहते हैं। वे देशवासियों को रामायण के प्रतीकों के माध्यम से समझाते हैं:
- उन्हें अपने खून से धरती पर लक्ष्मण रेखा खींच देनी चाहिए ताकि कोई दुश्मन रूपी 'रावण' भारत में प्रवेश न कर सके।
- अगर कोई हाथ भारत माता की ओर उठे, तो उसे तोड़ देना चाहिए।
- भारत की धरती 'सीता' के दामन की तरह पवित्र है, और अब उसकी रक्षा की जिम्मेदारी देशवासियों पर है, जिन्हें 'राम' और 'लक्ष्मण' दोनों की भूमिका निभानी है।
"मरते-मरते रहा बाँकपन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।"
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