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प्रहलाद अग्रवाल - तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र
परिचय और पृष्ठभूमि:
यह पाठ प्रसिद्ध गीतकार शैलेंद्र द्वारा निर्मित फिल्म 'तीसरी कसम' के निर्माण, संघर्ष और कलात्मक सफलता की मार्मिक कहानी है। यह बताता है कि कैसे एक संवेदनशील कवि ने व्यावसायिक लाभ की परवाह किए बिना साहित्य को सेल्युलाइड (फिल्म) पर उतारा।
1. फणीश्वरनाथ रेणु की रचना और फिल्म निर्माण
- ➤ शैलेंद्र ने हिंदी साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु की प्रसिद्ध कहानी 'मारे गए गुलफाम' पर आधारित फिल्म 'तीसरी कसम' का निर्माण किया।
- ➤ यह शैलेंद्र के जीवन की पहली और अंतिम फिल्म थी। उन्होंने इस फिल्म में कहानी की मूल आत्मा, संवेदना और 'लोक-तत्व' को पूरी ईमानदारी से परदे पर उतारा।
2. राजकपूर और शैलेंद्र की दोस्ती
- ➤ राजकपूर और शैलेंद्र बहुत अच्छे मित्र थे। जब शैलेंद्र ने राजकपूर को फिल्म की कहानी सुनाई, तो राजकपूर ने तुरंत काम करना स्वीकार कर लिया।
- ➤ राजकपूर ने मजाक में 'पूरा एडवांस' माँगा, और शैलेंद्र का चेहरा उतरने पर उन्होंने केवल एक रुपया एडवांस लेकर फिल्म में काम किया।
- ➤ राजकपूर ने एक सच्चे दोस्त की तरह शैलेंद्र को फिल्म निर्माण के खतरों और असफलता के जोखिम से भी आगाह किया था, लेकिन शैलेंद्र एक आदर्शवादी कवि थे जिन्होंने अपनी आत्म-संतुष्टि को प्राथमिकता दी।
3. फिल्म की कलात्मकता और अभिनेताओं का प्रदर्शन
- ➤ लेखक के अनुसार, 'तीसरी कसम' फिल्म नहीं, बल्कि "सेल्युलाइड पर लिखी कविता" थी।
- ➤ राजकपूर का अभिनय: उस समय राजकपूर एशिया के सबसे बड़े 'शो-मैन' थे, लेकिन इस फिल्म में उन्होंने अपने स्टारडम को पूरी तरह भुलाकर एक देहाती गाड़ीवान 'हीरामन' के चरित्र को जीवंत कर दिया। उन्होंने आँखों से अभिनय किया और हीरामन की मासूमियत को परदे पर उतारा।
- ➤ वहीदा रहमान का अभिनय: वहीदा रहमान ने 'हीराबाई' (नौटंकी की बाई) की भूमिका में गजब का अभिनय किया और सस्ती साड़ी में लिपटी होने के बावजूद अपनी ऊंचाइयों को छू लिया।
4. गीत, संगीत और संवेदना
- ➤ फिल्म का संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था। इसके गीत फिल्म के रिलीज होने से पहले ही बेहद लोकप्रिय हो गए थे।
- ➤ शैलेंद्र के गीत भावुक थे लेकिन कठिन नहीं। वे दर्शकों की रुचि की आड़ में उथलापन थोपते नहीं थे, बल्कि रुचियों को परिष्कृत करने का प्रयास करते थे।
- ➤ फिल्म दुख को भी सहज रूप में दिखाती है, उसे बेचने या महिमामंडित (Glorify) करने का प्रयास नहीं करती। इसमें जीवन की हकीकत और संघर्ष का संदेश है।
5. व्यावसायिक असफलता और पुरस्कार
- ➤ इतनी खूबियों के बावजूद, फिल्म को वितरक (Distributors) नहीं मिले क्योंकि फिल्म में विशुद्ध संवेदना थी और मुनाफा कमाने का गणित नहीं था।
- ➤ फिल्म कब आई और कब चली गई, पता ही नहीं चला। इसका प्रचार भी नहीं हो पाया। शैलेंद्र को इस असफलता से गहरा आघात लगा।
- ➤ इसके बावजूद, फिल्म को 'राष्ट्रपति स्वर्ण पदक' (President's Gold Medal) मिला, बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन का सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार मिला और मास्को फिल्म फेस्टिवल में भी इसे पुरस्कृत किया गया।
6. शैलेंद्र का व्यक्तित्व
- ➤ शैलेंद्र फिल्म इंडस्ट्री की चकाचौंध में रहते हुए भी एक शांत नदी की तरह थे। वे एक सच्चे कवि-हृदय व्यक्ति थे।
- ➤ उन्हें अपार संपत्ति या यश की लालसा नहीं थी, बल्कि वे आत्म-संतुष्टि चाहते थे। उन्होंने फिल्म निर्माण के तौर-तरीकों और छल-कपट को नहीं अपनाया, इसीलिए उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
- ➤ लेखक के अनुसार, 'तीसरी कसम' जैसी संवेदनशील फिल्म केवल एक सच्चा कवि ही बना सकता था।
"व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है।" — शैलेंद्र के गीतों का सार।
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