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रवीन्द्रनाथ ठाकुर - आत्मत्राण

1. कवि परिचय: रवींद्रनाथ ठाकुर

  • जीवन और उपलब्धियां: रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 1861 में बंगाल के एक संपन्न परिवार में हुआ था। वे नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले भारतीय हैं।
  • शिक्षा और कार्य: इनकी शिक्षा घर पर ही हुई। उन्होंने प्रकृति, संगीत और चित्रकला के प्रति विशेष प्रेम रखा। उन्होंने 'शांतिनिकेतन' नामक एक अनूठे शैक्षिक और सांस्कृतिक संस्थान की स्थापना की।
  • प्रमुख रचनाएं: उनकी प्रमुख कृतियों में 'गीतांजलि' (जिसके लिए नोबेल मिला), 'नैवेद्य', 'गोरा', 'घरे बाइरे' आदि शामिल हैं। उन्होंने लगभग एक हजार कविताएं और दो हजार गीत लिखे, जो 'रवींद्र संगीत' के नाम से जाने जाते हैं।

2. पाठ प्रवेश एवं अनुवाद

  • मूल भाव: कवि का मानना है कि जिस प्रकार तैरने वाले को खुद ही हाथ-पांव चलाने पड़ते हैं और परीक्षार्थी को परीक्षा खुद देनी पड़ती है, उसी प्रकार जीवन के संघर्ष भी स्वयं ही करने पड़ते हैं।
  • ईश्वर से अपेक्षा: प्रभु सब कुछ करने में समर्थ हैं, फिर भी कवि यह नहीं चाहता कि ईश्वर उसकी मुश्किलें आसान कर दें। वह केवल संघर्ष करने की शक्ति और आत्मबल मांगता है।
  • अनुवाद: यह कविता मूल रूप से बांग्ला में थी, जिसका हिंदी अनुवाद आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने किया है।

3. कविता 'आत्मत्राण' का विस्तृत सारांश

इस प्रार्थना गीत में कवि ईश्वर से विपत्तियों को टालने की नहीं, बल्कि उनका सामना करने की शक्ति मांगता है:

  • विपदाओं में निर्भयता: कवि प्रार्थना करता है कि हे ईश्वर! मुझे विपत्तियों (मुसीबतों) से बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं है। मैं केवल यह चाहता हूं कि मुसीबत आने पर मैं डरूँ नहीं, बल्कि निडर रहूं।
  • दुःख पर विजय: दुःख और कष्ट से पीड़ित चित्त (मन) के लिए कवि सांत्वना नहीं मांगता। वह चाहता है कि उसे दुःख पर विजय प्राप्त करने की शक्ति मिले।
  • आत्मबल की कामना: यदि विपत्ति के समय कोई सहायक या मददगार न मिले, तो भी कवि का अपना बल और पौरुष (हिम्मत) डगमगाना नहीं चाहिए।
  • नुकसान में भी हौसला: संसार में यदि केवल हानि उठानी पड़े और धोखा ही मिले, तो भी कवि का मन उस विनाश को स्वीकार न करे (अर्थात वह हार न माने)।
  • तरने की शक्ति: कवि यह प्रार्थना नहीं करता कि भगवान आकर उसकी रक्षा करें (त्राण करें)। वह केवल रोगों से मुक्त रहकर मुसीबतों के सागर को पार करने (तरने) की शक्ति मांगता है।
  • भार वहन करने की क्षमता: कवि अपने भार को कम करने की या सांत्वना पाने की भीख नहीं मांगता। उसकी केवल यह विनती है कि वह अपने जीवन के भार को निडर होकर वहन कर सके।
  • सुख में स्मरण: सुख के दिनों में कवि सिर झुकाकर ईश्वर का चेहरा हर पल पहचानना चाहता है (अर्थात सुख में भी ईश्वर को भूलना नहीं चाहता)।
  • दुःख में अटूट विश्वास: दुख भरी रात में जब पूरी दुनिया उसे धोखा दे या उस पर विपत्ति आए, तब भी कवि ईश्वर से यही चाहता है कि उस क्षण उसके मन में ईश्वर के प्रति रत्ती भर भी संदेह उत्पन्न न हो।
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