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सुमित्रानंदन पंत - पर्वत प्रदेश में पावस
कवि: सुमित्रानंदन पंत
मुख्य विषय: वर्षा ऋतु में पहाड़ों पर पल-पल बदलती प्रकृति के सौंदर्य का सजीव चित्रण।
1. पावस ऋतु और प्रकृति का बदलता रूप
- ➤ पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु (पावस) का आगमन हो चुका है। इस समय प्रकृति अपना रूप हर पल बदल रही है। कभी धूप खिलती है, तो कभी अचानक बादलों का घेरा छा जाता है।
2. विशाल पर्वत और तालाब का दृश्य
- ➤ पर्वत का आकार: पर्वत की श्रृंखला करधनी (कमर में पहनने वाला आभूषण) के आकार की है, जो दूर-दूर तक फैली हुई है।
- ➤ पर्वत की आँखें: पर्वत पर खिले हुए हजारों फूल उसकी आँखों (दृग-सुमन) के समान लग रहे हैं।
- ➤ प्राकृतिक दर्पण: पर्वत के चरणों में एक विशाल तालाब फैला हुआ है। उसका पानी इतना साफ और शांत है कि वह एक दर्पण (आईने) जैसा काम कर रहा है। पर्वत अपनी हजारों फूल रूपी आँखों से नीचे तालाब के पानी में अपना विशाल आकार निहार रहा है।
3. झरने और उनका संगीत
- ➤ पहाड़ों से गिरते हुए झरने ऐसे प्रतीत हो रहे हैं जैसे मोतियों की सुंदर लड़ियाँ लटक रही हों।
- ➤ झरनों के गिरने से पैदा होने वाला झाग उनकी सुंदरता को बढ़ा रहा है।
- ➤ कल-कल बहते हुए ये झरने ऐसा लग रहा है मानो पर्वत का गौरव-गान गा रहे हों। इनकी आवाज नस-नस में उत्तेजना और उत्साह भर देती है।
4. वृक्षों की उच्चाकांक्षाएँ
- ➤ पहाड़ के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे पेड़ आकाश की ओर देख रहे हैं।
- ➤ ये पेड़ मानवीय 'उच्चाकांक्षाओं' (ऊँचा उठने की कामना) का प्रतीक हैं। वे एकदम शांत हैं, अपलक आकाश को निहार रहे हैं और थोड़े चिंतित भी दिखाई दे रहे हैं, मानो वे आकाश के रहस्यों को समझना चाहते हों।
5. मौसम का भयानक बदलाव और कोहरा
- ➤ अचानक मौसम में बड़ा बदलाव आता है। घने बादल उमड़ आते हैं जिससे पूरा पर्वत ढक जाता है।
- ➤ ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा पर्वत पारे (mercury) के समान चमकीले पंख लगाकर आकाश में उड़ गया हो।
- ➤ कोहरे और धुंध के कारण कुछ भी दिखाई नहीं देता, केवल झरनों की आवाज (रव-शेष) ही सुनाई देती रहती है।
6. इंद्र का जादू और साल के वृक्ष
- ➤ इतनी तेज बारिश होती है कि लगता है आकाश धरती पर टूट पड़ा है।
- ➤ कोहरे के कारण ऐसा लगता है जैसे तालाब में आग लग गई हो और उसमें से धुआँ उठ रहा हो।
- ➤ इस भयानक दृश्य से डरकर 'साल' के विशाल वृक्ष धरती में धँस गए प्रतीत होते हैं (कोहरे में ओझल हो जाते हैं)।
- ➤ कवि अंत में कहते हैं कि यह सब वर्षा के देवता 'इंद्र' का खेल है, जो अपने बादल रूपी विमान में बैठकर जादू (इंद्रजाल) दिखा रहे हैं।
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