निदा फ़ाज़ली - अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले
पाठ परिचय
यह पाठ निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखित है। इसमें लेखक ने समय के साथ मनुष्यों में कम होती संवेदनशीलता और प्रकृति के प्रति बढ़ती क्रूरता का वर्णन किया है। लेखक ने कई ऐतिहासिक और पौराणिक उदाहरणों के माध्यम से यह समझाया है कि कैसे पहले के लोग पशु-पक्षियों के दुख से दुखी होते थे, लेकिन आज का मनुष्य केवल अपने स्वार्थ में सिमट कर रह गया है।
मुख्य बिंदु और विस्तृत सारांश
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1 सुलेमान (सलोमन) की संवेदनशीलता
ईसा से 1025 वर्ष पूर्व एक बादशाह थे जिनका नाम सुलेमान (बाइबल में सोलोमन) था। वे केवल इंसानों के ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों के भी राजा थे और उनकी भाषा समझते थे। एक बार जब उनकी फौज गुजर रही थी, तो चींटियों ने डरकर अपनी जान बचाने की बात कही। यह सुनकर सुलेमान ने अपनी फौज रोक दी और चींटियों से कहा कि वे घबराएँ नहीं, क्योंकि ईश्वर ने उन्हें सबका रखवाला बनाया है, मुसीबत नहीं।
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2 सिंधी कवि शेख अयाज़ के पिता का प्रसंग
सिंधी भाषा के महाकवि शेख अयाज़ ने अपनी आत्मकथा में अपने पिता का एक किस्सा लिखा है। एक दिन उनके पिता कुएँ से नहाकर लौटे और भोजन करने बैठे। जैसे ही उन्होंने रोटी का कौर तोड़ा, उन्होंने अपनी बाजू पर एक काला च्योंटा रेंगते हुए देखा। वे तुरंत भोजन छोड़कर उठ खड़े हुए। जब उनसे कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उन्होंने एक घर वाले को बेघर कर दिया है, इसलिए वे उसे वापस उसके घर (कुएँ पर) छोड़ने जा रहे हैं।
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3 पैगंबर नूह (लश्कर) का पश्चाताप
बाइबल और अन्य पवित्र ग्रंथों में नूह नाम के एक पैगंबर का जिक्र है, जिनका असली नाम लश्कर था। उन्हें 'नूह' (जिसका अर्थ है रोने वाला) इसलिए कहा गया क्योंकि वे जीवन भर रोते रहे। इसका कारण एक घायल कुत्ता था जिसे उन्होंने "गंदे कुत्ते" कहकर दुत्कार दिया था। कुत्ते ने जवाब दिया कि "न मैं अपनी मर्जी से कुत्ता हूँ, न तुम अपनी पसंद से इंसान, बनाने वाला सबका वही एक है।" इस बात ने नूह को इतना दुखी किया कि वे उम्र भर पछताते रहे।
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4 प्रकृति और मनुष्य का बदलता रिश्ता
लेखक बताते हैं कि धरती केवल मनुष्यों की नहीं है, इसमें पशु, पक्षी, नदी, पहाड़ सबका बराबर का हिस्सा है। लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धि से बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ी कर दी हैं। पहले लोग बड़े दालानों और आँगन वाले घरों में मिल-जुलकर रहते थे, अब जीवन छोटे-छोटे डिब्बों (फ्लैट्स) में सिमट गया है। बढ़ती आबादी ने समुद्र को पीछे धकेल दिया है और पेड़ों को काटकर रास्ते बना लिए हैं, जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है।
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5 प्रकृति का गुस्सा (मुंबई का उदाहरण)
प्रकृति की भी सहनशक्ति की एक सीमा होती है। जब मुंबई में बिल्डरों ने समुद्र की जमीन हथियाना शुरू किया, तो समुद्र पहले सिमटा, फिर उकड़ूँ बैठा और अंत में उसे गुस्सा आ गया। उसने अपनी लहरों पर दौड़ते हुए तीन बड़े जहाजों को उठाकर बच्चों की गेंद की तरह तीन अलग-अलग दिशाओं (वरली, बांद्रा और गेटवे ऑफ इंडिया) में फेंक दिया। यह घटना बताती है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम भयानक हो सकता है।
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6 लेखक की माँ की नसीहतें
लेखक अपनी माँ की बातों को याद करते हैं जो प्रकृति के प्रति बेहद संवेदनशील थीं। वे कहती थीं:
- सूरज ढलने के बाद पेड़ों से पत्ते मत तोड़ो, वे रोते हैं।
- दीया-बत्ती के समय फूल मत तोड़ो, वे बदुआ देते हैं।
- नदी पर जाओ तो उसे सलाम करो, वह खुश होती है।
- कबूतरों और मुर्गों को मत सताओ, क्योंकि वे अज़ान देकर सबको जगाते हैं और पैगंबर को भी प्यारे हैं।
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7 ग्वालियर की घटना (संवेदना का उदाहरण)
लेखक ग्वालियर के अपने पुराने घर की एक घटना बताते हैं। रोशनदान में कबूतरों ने घोंसला बनाया था। एक बार बिल्ली ने एक अंडा तोड़ दिया। लेखक की माँ ने दूसरे अंडे को बचाने की कोशिश की, लेकिन वह उनके हाथ से गिरकर टूट गया। कबूतरों के दुख को देखकर माँ की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने इस 'गुनाह' की माफी के लिए पूरे दिन रोज़ा (उपवास) रखा और नमाज़ पढ़कर ईश्वर से माफी माँगती रहीं।
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8 मुंबई (वर्सोवा) की घटना (संवेदना का अभाव)
ग्वालियर से मुंबई आते-आते दुनिया बदल गई। वर्सोवा में लेखक के फ्लैट में दो कबूतरों ने घोंसला बनाया और अपने बच्चों को खिलाने आते-जाते थे। इससे लेखक की चीजों को नुकसान होता था और गंदगी होती थी। इस परेशानी से तंग आकर लेखक की पत्नी ने वहाँ जाली लगा दी और खिड़की बंद कर दी। अब कबूतर खिड़की के बाहर उदास बैठे रहते हैं।
निष्कर्ष
पाठ का अंत इस दुखद सत्य के साथ होता है कि अब न तो सोलोमन जैसे लोग हैं जो जानवरों की भाषा समझें, और न ही लेखक की माँ जैसे लोग हैं जो उनके दुख में रात भर रोएँ। आधुनिकता की दौड़ में दूसरों के दुख से दुखी होने वाली भावना अब खत्म हो चुकी है।