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कबीर - साखी
1. कवि परिचय (कबीर दास)
- जीवन काल: कबीर का जन्म 1398 में काशी में हुआ माना जाता है। उन्होंने लगभग 120 वर्ष की आयु पाई और जीवन के अंतिम क्षण मगहर में बिताए।
- व्यक्तित्व: वे गुरु रामानंद के शिष्य थे। कबीर एक क्रांतदर्शी कवि थे जो समाज सुधार में विश्वास रखते थे।
- विचारधारा: उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों पर तीखी चोट की और आत्म-ज्ञान व अनुभव को किताबी ज्ञान से ऊपर रखा। वे निराकार (अरूप) ईश्वर में विश्वास करते थे।
- भाषा शैली: उनकी भाषा को 'सधुक्कड़ी' या 'पंचमेल खिचड़ी' कहा जाता है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी शब्दों का मिश्रण है।
2. 'साखी' का अर्थ
'साखी' शब्द 'साक्षी' (गवाह) का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है—प्रत्यक्ष ज्ञान। यह ज्ञान गुरु अपने शिष्य को अनुभव के आधार पर देता है। प्रस्तुत साखियाँ दोहा छंद में लिखी गई हैं।
3. साखियों का भावार्थ एवं मुख्य बिंदु
मधुर वाणी का महत्व
"ऐसी बा़णी बोलिये, मन का आपा खोइ..."
- कबीर जी कहते हैं कि हमें अपने मन का अहंकार (आपा) त्यागकर ऐसी मीठी बोली बोलनी चाहिए।
- मधुर वाणी बोलने से सुनने वाले को सुख मिलता है और बोलने वाले का अपना शरीर (तन) भी शीतल और शांत रहता है।
ईश्वर की सर्वव्यापकता
"कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढ़ूँढ़ै बन माहि..."
- जैसे हिरण की अपनी नाभि में कस्तूरी (सुगंधित पदार्थ) होती है, लेकिन वह अज्ञानतावश उसे पूरे जंगल में ढूंढता फिरता है।
- ठीक उसी प्रकार, ईश्वर घट-घट में (कण-कण में) और हृदय में निवास करते हैं, लेकिन अज्ञानी मनुष्य उन्हें मंदिरों और तीर्थों में ढूंढता रहता है।
अहंकार और ईश्वर
"जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि..."
- 'मैं' का अर्थ यहाँ अहंकार (Ego) है। जब तक मनुष्य के भीतर अहंकार होता है, उसे ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती।
- जब ईश्वर का साक्षात्कार होता है, तो अहंकार मिट जाता है। ज्ञान रूपी दीपक के जलने से अज्ञान का सारा अंधकार मिट जाता है।
संसार और संत का अंतर
"सुखिया सब संसार है, खावै अरु सोवै..."
- संसार के लोग भौतिक सुखों (खाने और सोने) में मस्त हैं और खुद को सुखी मानते हैं, जबकि वे अज्ञान की नींद में सोए हुए हैं।
- कबीर दास जी दुखी हैं क्योंकि वे 'जाग' रहे हैं (उन्हें नश्वरता और ईश्वर का ज्ञान है)। वे संसार की दशा देखकर रोते हैं। यहाँ 'सोना' अज्ञान का और 'जागना' आत्म-ज्ञान का प्रतीक है।
ईश्वर-विरह की पीड़ा
"बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ..."
- जब शरीर में परमात्मा से बिछड़ने का विरह रूपी साँप (भुवंगम) बस जाता है, तो उस पर कोई भी मंत्र या दवा असर नहीं करती।
- राम (ईश्वर) के वियोग में भक्त जीवित नहीं रह सकता, और यदि जीता भी है, तो उसकी स्थिति पागलों (बौरा) जैसी हो जाती है।
निंदक का महत्व
"निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ..."
- कबीर कहते हैं कि अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास (आंगन में कुटिया बनाकर) रखना चाहिए।
- निंदक बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को निर्मल (साफ) कर देता है, क्योंकि वह हमारी कमियाँ बताकर हमें सुधरने का मौका देता है।
प्रेम का महत्व (किताबी ज्ञान vs प्रेम)
"पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ..."
- मोटी-मोटी किताबें (शास्त्र) पढ़कर संसार मर गया, लेकिन कोई सच्चा ज्ञानी (पंडित) नहीं बन पाया।
- जो व्यक्ति ईश्वर के प्रेम का एक अक्षर (एकै आषिर) भी पढ़ लेता है या समझ लेता है, वही सच्चा पंडित (ज्ञानी) होता है।
त्याग और समर्पण
"हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि..."
- कबीर कहते हैं कि उन्होंने विरह और भक्ति की जलती हुई लकड़ी (मुराड़ा) हाथ में लेकर अपना घर (सांसारिक मोह-माया और अहंकार) जला दिया है।
- अब वे उनका घर जलाएंगे जो उनके साथ इस भक्ति के मार्ग पर चलने को तैयार हैं। इसका अर्थ है कि ईश्वर को पाने के लिए मोह-माया का त्याग आवश्यक है।
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