मैथलीशरण गुप्त - मनुष्यता
परिचय एवं केंद्रीय भाव
यह कविता राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित है। इसमें कवि ने बताया है कि केवल सांस लेना और जीवित रहना ही मनुष्यता नहीं है। सच्चा मनुष्य वह है जो दूसरों के हित के लिए जीता और मरता है। कवि ने परोपकार, विश्व-बंधुत्व और उदारता को मनुष्य के सबसे बड़े आभूषण बताया है।
अध्याय का विस्तृत बिंदुवार सारांश
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1. मृत्यु का भय और 'सुमृत्यु'
कवि कहते हैं कि मनुष्य नश्वर (मरणशील) है, इसलिए हमें मृत्यु से डरना नहीं चाहिए। हमें ऐसा जीवन जीना चाहिए कि मरने के बाद भी लोग हमें याद रखें। यदि कोई मनुष्य ऐसी 'सुमृत्यु' (गौरवशाली मृत्यु) नहीं प्राप्त करता, तो उसका जीना और मरना दोनों व्यर्थ हैं। सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दे।
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2. पशु-प्रवृत्ति बनाम मनुष्यता
कवि के अनुसार, केवल अपने लिए खाना और जीना 'पशु-प्रवृत्ति' (जानवरों जैसा स्वभाव) है, क्योंकि पशु केवल अपने पेट भरने की चिंता करते हैं। इसके विपरीत, सच्चा मनुष्य वह है जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई के लिए कार्य करता है।
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3. पौराणिक दानी महापुरुषों के उदाहरण
कवि ने इतिहास के प्रसिद्ध दानी व्यक्तियों का उदाहरण देकर त्याग का महत्व समझाया है:
- रंतिदेव: भूख से व्याकुल होने पर भी अपने हिस्से का भोजन एक अतिथि को दे दिया।
- दधीचि: देवताओं की रक्षा और लोक-हित के लिए अपनी अस्थियों (हड्डियों) का दान कर दिया।
- उशीनर (राजा शिवि): एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर का मांस काटकर दे दिया।
- कर्ण: अपनी जान की परवाह न करते हुए अपने शरीर का कवच और कुंडल दान कर दिया।
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4. सहानुभूति और उदारता की शक्ति
मनुष्य के मन में दया और सहानुभूति का भाव होना चाहिए। यही सबसे बड़ी पूंजी (महाविभूति) है। पृथ्वी भी उदार व्यक्तियों की सेवा करती है और ईश्वर भी उनके साथ होते हैं। कवि ने महात्मा बुद्ध का उदाहरण दिया है, जिन्होंने करुणा के वश होकर तत्कालीन परंपराओं का विरोध किया, और इसी दयाभाव के कारण पूरी दुनिया आज भी उन्हें पूजती है।
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5. धन का घमंड और ईश्वरीय संरक्षण
कवि चेतावनी देते हैं कि कभी भी धन या संपत्ति के नशे में चूर होकर घमंड नहीं करना चाहिए। किसी को भी खुद को 'सनाथ' (शक्तिशाली) और दूसरों को 'अनाथ' (कमजोर) नहीं समझना चाहिए। यहाँ कोई अनाथ नहीं है क्योंकि 'त्रिलोकीनाथ' (ईश्वर) सबके साथ हैं और वे बहुत दयालु हैं। जो व्यक्ति प्रभु के रहते हुए भी व्याकुल रहता है, वह बहुत भाग्यहीन है।
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6. विश्व-बंधुत्व और एकता
कवि कहते हैं कि सबसे बड़ा ज्ञान यह है कि 'प्रत्येक मनुष्य हमारा भाई-बंधु है'। पुराणों के अनुसार हम सभी एक ही परमपिता (स्वयंभू) की संतान हैं। कर्मों के अनुसार हमारे बाहरी रूप भले ही अलग हों, लेकिन आत्मा (अंत्तरात्मा) से हम सभी एक हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक भाई दूसरे भाई की पीड़ा न हरे।
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7. जीवन का अभीष्ट मार्ग
हमें जीवन के मार्ग पर हँसते-खेलते आगे बढ़ना चाहिए। रास्ते में आने वाली विपत्तियों और बाधाओं को हटाते हुए, बिना किसी भेदभाव के सभी को साथ लेकर चलना चाहिए। एक-दूसरे का सहारा बनकर ही हम उन्नति कर सकते हैं और जीवन के सागर को पार कर सकते हैं। सच्चा समर्थ भाव वही है जिससे अपना कल्याण हो और साथ ही दूसरों का भी उद्धार हो।
निष्कर्ष: "वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।"
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