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अध्याय 13, सुब्रह्मण्यम 'भारती' के जीवन और उनके योगदान पर आधारित है। स्रोतों के आधार पर इस अध्याय का बिंदुवार सारांश निम्नलिखित है:
- जन्म और बचपन: महाकवि सुब्रह्मण्यम 'भारती' का जन्म सितंबर 1882 में तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के एक गाँव में हुआ था। उनके बचपन का नाम सुब्बैया था और वे बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे।
- 'भारती' की उपाधि: सुब्बैया ने मात्र सात वर्ष की आयु में कविता लिखना शुरू कर दिया था। उनकी काव्य प्रतिभा से प्रभावित होकर, एट्टयपुरम् के राजा ने उन्हें मात्र 11 वर्ष की आयु में 'भारती' की उपाधि से विभूषित किया।
- काशी का प्रभाव: पिता के निधन के बाद, 1898 में वे काशी चले गए। वहाँ उन्होंने संस्कृत और हिंदी का गहन अध्ययन किया और 1901 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। काशी के जीवन ने उनके व्यक्तित्व और पहनावे (पगड़ी और मूँछें) पर अमिट छाप छोड़ी।
- क्रांतिकारी विचार और राष्ट्रभक्ति: 1905 के 'बंग-भंग' आंदोलन ने उनके हृदय पर गहरा प्रभाव डाला, जिससे वे एक क्रांतिकारी कवि बन गए। उन्होंने अपनी ओजस्वी कविताओं के माध्यम से देशवासियों को पराधीनता की बेड़ियाँ तोड़ने की प्रेरणा दी।
- राष्ट्रकवि का सम्मान: वर्ष 1907 में उन्हें तमिल भाषा के 'राष्ट्रकवि' के रूप में सम्मानित किया गया। उनका प्रसिद्ध कविता-संग्रह 'स्वदेश गीत' इसी समय के दौरान प्रकाशित हुआ था।
- निर्वासन और साहित्यिक रचनाएँ: ब्रिटिश सरकार के डर से वे पांडिचेरी चले गए। वहाँ प्रवास के दौरान उन्होंने 'कुयिलपाट्टु' और 'पांचाली सप्तम' जैसी प्रसिद्ध रचनाएँ कीं और नारी-जागरण पर भी कविताएँ लिखीं।
- गांधी जी से भेंट और पत्रकारिता: 1919 में उनकी भेंट महात्मा गांधी से हुई, जो उनके भाषण से बहुत प्रभावित हुए। बाद में उन्होंने चेन्नई में 'स्वदेश मित्रन' अखबार के संपादन का कार्यभार भी संभाला।
- असामयिक मृत्यु: जुलाई 1921 में एक मंदिर के हाथी द्वारा घायल कर दिए जाने के कारण वे अचेत हो गए और सितंबर 1921 में मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
- साहित्यिक विरासत: भारती ने अपनी वाणी से गुलाम भारत के लोगों में देशप्रेम, भाषाप्रेम और नारी स्वतंत्रता की भावना जाग्रत की। वे न केवल तमिल-भाषी लोगों के लिए बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व का प्रतीक हैं।
इन स्रोतों में मुंशी प्रेमचंद के बारे में भी एक संक्षिप्त लेख दिया गया है, जिसमें महादेवी वर्मा ने उनके सरल व्यक्तित्व और उनके साहित्य की मार्मिकता का वर्णन किया है।
एक छोटा सा उदाहरण: सुब्रह्मण्यम 'भारती' का जीवन उस मशाल की तरह था जिसने न केवल स्वयं जलकर प्रकाश फैलाया, बल्कि पराधीनता के अंधेरे में डूबे पूरे देश को आजादी की राह दिखाई।
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