मेरे बचपन के दिन
परिचय: यह महादेवी वर्मा द्वारा लिखित एक संस्मरण है जिसमें उन्होंने अपने बचपन की स्मृतियों, तत्कालीन सामाजिक वातावरण और विद्यालय के अनुभवों का सजीव चित्रण किया है।
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1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
महादेवी वर्मा के परिवार में पिछले 200 वर्षों से किसी लड़की का जन्म नहीं हुआ था। उस समय लड़कियों को जन्म लेते ही मार दिया जाता था। महादेवी जी का जन्म उनके बाबा द्वारा बहुत दुर्गा-पूजा करने के बाद हुआ, इसलिए उनका बहुत स्वागत-सत्कार हुआ और उन्हें वह सब नहीं सहना पड़ा जो उस समय अन्य लड़कियों को सहना पड़ता था।
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2. घर का शैक्षिक वातावरण
परिवार में कई भाषाओं का संगम था। बाबा को फारसी और उर्दू आती थी, जबकि पिता ने अंग्रेजी पढ़ी थी। महादेवी जी की माता जबलपुर से आई थीं और वे अपने साथ हिंदी लाईं। माता जी धार्मिक स्वभाव की थीं और उन्होंने ही महादेवी जी को सबसे पहले 'पंचतंत्र' पढ़ना सिखाया। बाबा चाहते थे कि वे विदुषी बनें, इसलिए उन्हें संस्कृत भी पढ़ाई गई।
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3. क्रॉस्थवेट गर्ल्स कॉलेज और सुभद्रा कुमारी चौहान
पांचवें दर्जे में महादेवी जी का दाखिला इलाहाबाद के क्रॉस्थवेट गर्ल्स कॉलेज में कराया गया। वहाँ का वातावरण बहुत अच्छा था और विभिन्न धर्मों की लड़कियाँ एक ही मेस में खाना खाती थीं। वहाँ उन्हें छात्रावास में सुभद्रा कुमारी चौहान मिलीं, जो उनसे दो कक्षा आगे थीं। सुभद्रा जी पहले से ही कविताएँ लिखती थीं और प्रतिष्ठित हो चुकी थीं।
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4. कविता लिखने की शुरुआत
महादेवी जी बचपन से ही तुकबंदी करती थीं। सुभद्रा जी से प्रेरणा पाकर उन्होंने खड़ी बोली में लिखना शुरू किया। पहले वे छिपकर लिखती थीं, लेकिन एक दिन सुभद्रा जी ने उनकी किताबें तलाशीं और उनकी कविताएँ पकड़ लीं। इसके बाद दोनों में गहरी मित्रता हो गई और वे साथ में पेड़ की डाल पर बैठकर तुकबंदी करने लगीं। उनकी रचनाएँ 'स्त्री दर्पण' पत्रिका में छपने लगीं।
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5. कवि सम्मेलन और बापू से भेंट
महादेवी जी कवि सम्मेलनों में जाने लगीं और अक्सर प्रथम पुरस्कार जीतती थीं। एक बार उन्हें पुरस्कार में चाँदी का एक सुंदर नक्काशीदार कटोरा मिला। उसी समय आनंद भवन में महात्मा गांधी आए हुए थे। महादेवी जी उन्हें अपना कटोरा दिखाने गईं। जब उन्होंने बापू को कटोरा दिखाया, तो बापू ने देशहित के लिए वह कटोरा उनसे मांग लिया। महादेवी जी ने खुशी-खुशी वह कटोरा दे दिया।
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6. छात्रावास में सांप्रदायिक सद्भाव
छात्रावास में अवध, बुंदेलखंड आदि अलग-अलग स्थानों से आई लड़कियाँ अपनी-अपनी बोली (अवधी, बुंदेली) में बात करती थीं, लेकिन पढ़ाई हिंदी में होती थी। वहाँ जेबुन्निसा नाम की एक मराठी लड़की भी थी जो मराठी मिली-जुली हिंदी बोलती थी। उस समय साम्प्रदायिकता बिल्कुल नहीं थी; सभी प्रेम से एक परिवार की तरह रहते थे।
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7. ताई साहिबा और पारिवारिक प्रेम
महादेवी जी के पड़ोस में एक नवाब परिवार रहता था। उनकी बेगम को वे 'ताई साहिबा' कहती थीं। दोनों परिवारों में बहुत घनिष्ठ संबंध थे। वे एक-दूसरे के त्यौहार (जन्मदिन, रक्षाबंधन, मुहर्रम) मिल-जुलकर मनाते थे। ताई साहिबा ने ही महादेवी जी के छोटे भाई का नाम 'मनमोहन' रखा था, जो बाद में यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने।
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8. निष्कर्ष
लेखिका अंत में कहती हैं कि उस समय का माहौल आज के समय से बिल्कुल अलग था। उस समय हिंदू-मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारा एक सपने जैसा सच था, जो आज खो गया है। यदि वह सपना आज भी सच होता, तो भारत की कहानी कुछ और ही होती।
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