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सवैये (रसखान)
1. कवि परिचय: रसखान
- जीवन काल: रसखान का जन्म सन् 1548 के आसपास माना जाता है और मृत्यु सन् 1628 के लगभग हुई।
- मूल नाम व स्थान: इनका मूल नाम 'सैयद इब्राहिम' था और ये दिल्ली के आस-पास के रहने वाले थे।
- कृष्ण भक्ति: कृष्ण भक्ति ने उन्हें इतना मोहित किया कि उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली और ब्रजभूमि में जा बसे।
- प्रमुख रचनाएँ: 'सुजान रसखान' और 'प्रेमवाटिका' इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। इनकी रचनाओं का संग्रह 'रसखान रचनावली' में मिलता है।
- काव्य विशेषता: इनके काव्य में कृष्ण के रूप-माधुर्य, ब्रज-महिमा और राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का वर्णन मिलता है। इनकी भाषा अत्यंत सरस और मनोरम ब्रजभाषा है।
2. पहले सवैये का सारांश: पुनर्जन्म की अभिलाषा
इस सवैये में कवि रसखान ने ब्रजभूमि के प्रति अपने गहरे प्रेम को व्यक्त किया है। वे अगले जन्म में किसी भी रूप में ब्रज में ही रहना चाहते हैं:
- मनुष्य के रूप में: यदि वे मनुष्य बनें, तो वे गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच बसना चाहते हैं।
- पशु के रूप में: यदि वे पशु बनें, तो वे नन्द बाबा की गायों के बीच चरना चाहते हैं।
- पत्थर के रूप में: यदि वे पत्थर बनें, तो उसी गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनना चाहते हैं जिसे श्री कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से बचाने के लिए अपनी उंगली पर उठाया था।
- पक्षी के रूप में: यदि वे पक्षी बनें, तो यमुना नदी के किनारे स्थित कदम्ब के पेड़ की डालियों पर अपना बसेरा बनाना चाहते हैं।
3. दूसरे सवैये का सारांश: अनन्य प्रेम और त्याग
कवि कृष्ण और ब्रज से जुड़ी वस्तुओं के लिए संसार के सभी सुखों को त्यागने के लिए तैयार हैं:
- लकुटी और कमरिया: श्री कृष्ण की लाठी (लकुटी) और कंबल (कमरिया) के बदले वे तीनों लोकों का राज-पाठ छोड़ने को तैयार हैं।
- नन्द की गायें: नन्द की गायों को चराने के सुख के लिए वे आठों सिद्धियों और नौ निधियों (कुबेर का खजाना) के सुख को भी भुला सकते हैं।
- ब्रज के वन-बाग: कवि अपनी आँखों से ब्रज के वन, बाग और तालाबों को निहारते रहना चाहते हैं।
- करील के कुंजन: वे ब्रज की कांटेदार झाड़ियों (करील के कुंजन) में रहने के लिए सोने-चाँदी के करोड़ों महलों (कलधौत के धाम) को भी न्योछावर करने को तैयार हैं।
4. तीसरे सवैये का सारांश: गोपियों का स्वांग और मुरली के प्रति ईर्ष्या
इस सवैये में एक गोपी अपनी सखी के कहने पर कृष्ण का रूप धारण करने को तैयार होती है:
- कृष्ण की वेशभूषा: गोपी कहती है कि वह कृष्ण की तरह सिर पर मोरपंख धारण करेगी, गले में गुंजा की माला पहनेगी और पीले वस्त्र (पीतांबर) ओढ़कर, हाथ में लाठी लेकर ग्वालों के साथ वन में गायें चराएगी।
- मुरली से इनकार: वह कृष्ण का हर स्वांग रचने को तैयार है, लेकिन वह उस मुरली (बांसुरी) को अपने होठों पर नहीं रखेगी जो कृष्ण के होठों पर रखी रहती है।
- कारण: गोपियाँ मुरली को अपनी सौत (sautan) मानती हैं क्योंकि वह कृष्ण को उनसे दूर रखती है और कृष्ण हमेशा उसे अपने होठों से लगाए रहते हैं।
5. चौथे सवैये का सारांश: कृष्ण की मुस्कान और मुरली का जादू
इस पद में कृष्ण की मुरली की धुन और उनकी मुस्कान के अचूक प्रभाव का वर्णन है:
- कानों में उंगली: गोपी कहती है कि जब कृष्ण मंद-मंद स्वर में मुरली बजाएंगे, तो वह अपने कानों में उंगली डाल लेगी ताकि वह मोहित न हो जाए।
- गोधन गीत: भले ही कृष्ण अटारी पर चढ़कर 'गोधन' (ब्रज का लोकगीत) गाते रहें, गोपी पर उसका असर नहीं होगा।
- मुस्कान की विवशता: लेकिन गोपी अपनी विवशता व्यक्त करती है कि यदि उसने कृष्ण के मुख की मुस्कान देख ली, तो वह अपने आप को संभाल नहीं पाएगी। वह बार-बार कहती है—"सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै" (संभाली नहीं जाएगी)।
महत्वपूर्ण शब्दार्थ
कालिंदी: यमुना नदी | पुरंदर: इंद्र | कामरिया: कंबल | अटा: कोठा या छत | मंझारन: बीच में | गिरि: पहाड़ | कलधौत: सोना/चांदी | करील: कांटेदार झाड़ी।
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