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ल्हासा की ओर
1. यात्रा का परिचय और मार्ग
- यह पाठ राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित एक यात्रा-वृत्तांत है, जिसमें उन्होंने अपनी 1929-30 की पहली तिब्बत यात्रा का वर्णन किया है।
- उस समय भारतीयों को तिब्बत यात्रा की अनुमति नहीं थी, इसलिए लेखक ने यह यात्रा एक भिखमंगे के छद्म वेश में की थी।
- लेखक नेपाल के रास्ते तिब्बत गए थे। यह रास्ता व्यापारिक होने के साथ-साथ सैनिक रास्ता भी था, जिस पर जगह-जगह चीनी फौज की चौकियाँ और किले बने हुए थे।
2. तिब्बती समाज की स्थिति
- तिब्बत में जाति-पाँति और छुआछूत जैसी कुप्रथाएँ नहीं थीं और न ही वहाँ की औरतें परदा करती थीं।
- वहाँ यात्रियों का बहुत सत्कार होता था। अपरिचित व्यक्ति भी किसी के घर के अंदर जा सकता था और घर की सास या बहू से अपने लिए चाय बनवा सकता था।
- चाय मक्खन और सोडा-नमक मिलाकर बनाई जाती थी, जिसे मिट्टी के टोंटीदार बर्तन (खोटी) में परोसा जाता था।
- केवल बहुत निम्न श्रेणी के भिखमंगों को चोरी के डर से लोग घर में नहीं घुसने देते थे।
3. थोंगला के पहले पड़ाव का अनुभव
- लेखक के साथ 'सुमति' नाम का एक मंगोल भिक्षु था, जिसके वहां काफी जान-पहचान वाले लोग (यजमान) थे।
- भिखमंगे के वेश में होने के बावजूद, सुमति की पहचान के कारण उन्हें थोंगला के पास के गाँव में रहने के लिए अच्छी जगह मिल गई।
- इसके विपरीत, पाँच साल बाद जब लेखक एक 'भद्र यात्री' के वेश में घोड़े पर सवार होकर आए, तो उन्हें रहने के लिए जगह नहीं मिली और उन्हें एक गरीब झोपड़े में ठहरना पड़ा।
4. डाँड़े की खतरनाक यात्रा
- तिब्बत में 'डाँड़े' (ऊँचे पहाड़ी स्थान) सबसे खतरनाक जगहें मानी जाती थीं। सोलह-सत्रह हजार फीट की ऊँचाई होने के कारण यहाँ मीलों तक कोई आबादी नहीं थी।
- यहाँ डाकुओं का बहुत भय रहता था। निर्जन स्थानों के कारण यहाँ खून हो जाने पर भी कोई गवाह नहीं मिलता था और पुलिस भी यहाँ कम सक्रिय थी।
- हथियार का कानून न होने के कारण लोग लाठी की तरह पिस्तौल और बंदूक लेकर घूमते थे। डाकू पहले आदमी को मार देते थे, फिर देखते थे कि उसके पास पैसा है या नहीं।
- डाकुओं से बचने के लिए लेखक और उनके साथी भिखमंगे का रूप बना लेते थे और जहाँ भी खतरा लगता, टोपी उतारकर जीभ निकालकर "कूची-कूची" (दया-दया) कहते हुए भीख माँगने लगते थे।
5. लंकोर का रास्ता और लेखक का बिछड़ना
- पहाड़ की खड़ी चढ़ाई के लिए लेखक ने दो घोड़े किराए पर लिए।
- लेखक का घोड़ा बहुत सुस्त था, जिससे वह अपने साथियों से पिछड़ गया। वह गलती से एक डेढ़ मील गलत रास्ते पर चले गए और फिर वापस लौटना पड़ा।
- देर से पहुँचने पर सुमति बहुत नाराज हुए क्योंकि उन्होंने चाय को तीन बार गर्म किया था और बहुत सारे कंडे फूँक दिए थे। हालाँकि, सुमति जितनी जल्दी गुस्सा होते थे, उतनी ही जल्दी शांत भी हो जाते थे।
6. तिंरी समाधि-गिरि और गंडे
- तिंरी का मैदान पहाड़ों से घिरा हुआ एक टापू जैसा लगता था, जिसमें 'तिंरी समाधि-गिरि' नामक एक छोटी पहाड़ी थी।
- सुमति अपने यजमानों को बोधगया से लाए हुए कपड़े के 'गंडे' (मंत्र पढ़ी हुई गाँठ) बाँटते थे। लेखक ने उन्हें दूर-दराज के गाँवों में जाने से रोका और ल्हासा पहुँचकर पैसे देने का वादा किया।
7. शेकर विहार और विदाई
- तिब्बत की जमीन जागीरदारों में बँटी थी, जिसका ज्यादा हिस्सा मठों (विहारों) के पास था। खेती का इंतजाम भिक्षु देखते थे जो राजा से कम नहीं होते थे।
- शेकर विहार के मुखिया भिक्षु (नमसे) बहुत भद्र पुरुष थे और लेखक से बड़े प्रेम से मिले, जबकि लेखक का वेश भिखमंगे जैसा था।
- वहाँ एक मंदिर में 'कंजुर' (बुद्धवचन अनुवाद) की 103 हस्तलिखित पोथियाँ रखी थीं। प्रत्येक पोथी 15-15 सेर (लगभग 14-15 किलो) की थी।
- लेखक उन पुस्तकों को पढ़ने में रम गए। इसी बीच सुमति अपने यजमानों से मिलकर वापस आ गए। अगले दिन उन्होंने अपना सामान उठाया और भिक्षु नमसे से विदा लेकर आगे चल पड़े।
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