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प्रेमचंद के फटे जूते

परिचय

यह पाठ हरिशंकर परसाई द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध व्यंग्य निबंध है। इसमें लेखक ने हिंदी के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद के व्यक्तित्व की सादगी और उनके अंतर्भेदी सामाजिक दृष्टि का चित्रण किया है, साथ ही आज के समाज में व्याप्त दिखावे की प्रवृत्ति और अवसरवादिता पर करारा व्यंग्य किया है।

मुख्य बिंदु और सारांश

  • 1. प्रेमचंद का हुलिया और फोटो का दृश्य

    लेखक के सामने प्रेमचंद का एक फोटो है जिसमें वे अपनी पत्नी के साथ बैठे हैं। उन्होंने सिर पर मोटे कपड़े की टोपी, कुर्ता और धोती पहनी हुई है। उनकी कनपटी चिपकी है और गालों की हड्डियाँ उभर आई हैं, लेकिन घनी मूँछों के कारण चेहरा भरा-भरा लगता है। यह चित्र उनकी गरीबी और सादगी को दर्शाता है।

  • 2. फटे जूतों की स्थिति

    फोटो में प्रेमचंद के पैरों में कैनवास के जूते हैं। जूतों के फीते (बंद) बेतरतीब तरीके से बंधे हैं। फीतों के सिरों पर लगी लोहे की पत्री निकल चुकी है, जिससे छेदों में फीता डालने में परेशानी होती है। सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि बाएं पैर के जूते में एक बड़ा छेद हो गया है, जिससे उनकी उंगली बाहर निकल आई है।

  • 3. लेखक का आश्चर्य और प्रश्न

    लेखक प्रेमचंद के फटे जूते देखकर हैरान रह जाता है। वह सोचता है कि अगर फोटो खिंचवाने के लिए यह पोशाक है, तो घर में पहनने वाली पोशाक कैसी होगी? लेकिन जल्द ही लेखक को एहसास होता है कि प्रेमचंद के पास अलग-अलग मौकों के लिए अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी। वे जैसे भीतर हैं, वैसे ही बाहर भी हैं; उनमें दिखावे की कोई भावना नहीं है।

  • 4. दिखावे की संस्कृति पर कटाक्ष

    लेखक आज के जमाने के 'दिखावे' (Show-off) पर व्यंग्य करता है। लोग फोटो खिंचवाने के लिए दूसरों से जूते, कोट, और यहाँ तक कि मोटर और बीवी तक मांग लेते हैं। लोग इत्र लगाकर फोटो खिंचवाते हैं ताकि फोटो से 'खुशबू' आए। इसके विपरीत, महान कथाकार और युग-प्रवर्तक कहे जाने वाले प्रेमचंद के पास फोटो खिंचवाने के लिए भी साबुत जूते नहीं थे, फिर भी उनके चेहरे पर एक बेपरवाह विश्वास है।

  • 5. 'जूता' और 'टोपी' का प्रतीकात्मक अर्थ

    यहाँ 'जूता' समृद्धि और ताकत का प्रतीक है, जबकि 'टोपी' मान-सम्मान का। लेखक कहता है कि वैसे तो जूते की कीमत टोपी से हमेशा ज्यादा रही है, लेकिन आज के समय में एक जूते पर पचीसों टोपियां न्योछावर होती हैं (यानी धनवानों के सामने गुणवानों को झुकना पड़ता है)। प्रेमचंद ने स्वाभिमान (टोपी) को महत्व दिया और फटे जूते पहनने में शर्म महसूस नहीं की।

  • 6. लेखक और प्रेमचंद के जूतों की तुलना

    लेखक स्वीकार करता है कि उसका अपना जूता भी कोई बहुत अच्छा नहीं है। ऊपर से वह ठीक दिखता है और उंगली बाहर नहीं निकलती, लेकिन अंगूठे के नीचे का तला घिस गया है। लेखक 'पर्दे' (दिखावे) का महत्व जानता है, इसलिए वह अपनी फटी हुई हालत को छिपाकर रखता है, भले ही इससे उसका पंजा घायल हो जाए। दूसरी ओर, प्रेमचंद का पंजा सुरक्षित है भले ही उंगली दिख रही हो। प्रेमचंद दिखावे के लिए वास्तविकता को नहीं छिपाते।

  • 7. प्रेमचंद की व्यंग्य भरी मुस्कान

    फोटो में प्रेमचंद के चेहरे पर एक अधूरी और व्यंग्य भरी मुस्कान है। लेखक को लगता है कि यह मुस्कान उन लोगों पर है जो अपनी कमजोरियों (घिसे हुए तले) को छिपाते हैं और ऊपर से सभ्य दिखने का ढोंग करते हैं। प्रेमचंद मानो कह रहे हों कि "मैंने तो ठोकर मारकर जूता फाड़ लिया, उंगली बाहर आ गई, पर मेरा पाँव बच गया और मैं चलता रहा। लेकिन तुम लोग दिखावे के चक्कर में अपना तला (आधार) नष्ट कर रहे हो, तुम चलोगे कैसे?"

  • 8. 'टीले' से टक्कर और संघर्ष

    लेखक निष्कर्ष निकालता है कि प्रेमचंद का जूता इसलिए फटा क्योंकि वे जीवन भर सामाजिक कुरीतियों, शोषण और कठिनाइयों रूपी 'टीलों' (Obstacles) से टकराते रहे। उन्होंने रास्ते की रुकावटों से समझौता करके या बगल से निकलकर जाने की बजाय, उन्हें ठोकर मारी। इसी संघर्ष में उनका जूता फट गया, लेकिन उन्होंने अपने 'नेम-धर्म' और सिद्धांतों को नहीं छोड़ा।

  • 9. पैर की उंगली का इशारा

    लेखक अंत में समझ जाता है कि प्रेमचंद के फटे जूते से बाहर निकलती उंगली कोई शर्म की बात नहीं है, बल्कि वह एक इशारा है। वह उंगली उन घृणित चीजों और सामाजिक बुराइयों की तरफ इशारा कर रही है जिसे प्रेमचंद ने ठोकर मार-मारकर अपने जूते फाड़ लिए। वे समाज के पाखंडियों पर हंस रहे हैं।

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