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मेघ आए - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
कवि परिचय: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
- जन्म: इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में सन 1927 में हुआ था।
- शिक्षा: इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की।
- कार्यक्षेत्र: इन्होंने 'दिनमान' के उपसंपादक और प्रसिद्ध बाल पत्रिका 'पराग' के संपादक के रूप में कार्य किया।
- प्रमुख कृतियाँ: 'काठ की घंटियाँ', 'बाँस का पुल', 'एक सूनी नाव', 'गर्म हवाएँ', 'कुआनो नदी' और 'खूँटियों पर टाँगे लोग' उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं।
- सम्मान: इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- शैली: इनकी कविताओं में ग्रामीण संवेदना के साथ-साथ शहरी मध्यमवर्गीय जीवनबोध का सुंदर चित्रण मिलता है।
कविता का विस्तृत सारांश
प्रस्तुत कविता 'मेघ आए' में कवि ने बादलों के आगमन की तुलना शहर से गाँव आए एक सजे-धजे प्रवासी अतिथि (दामाद) से की है। कवि ने ग्रामीण संस्कृति और प्राकृतिक परिवर्तनों का बहुत ही सजीव चित्रण किया है।
मुख्य बिंदु:
- बादलों का आगमन: मेघ बहुत ही बन-ठन कर और सँवर कर आए हैं, जैसे शहर से कोई दामाद गाँव आता है।
- प्रकृति में हलचल: बादलों के आने की खबर देने के लिए हवा नाचती-गाती उनके आगे-आगे चलने लगी है। गाँव की गलियों में खिड़कियाँ और दरवाजे उत्साहवश खुलने लगे हैं ताकि लोग मेहमान को देख सकें।
- पेड़ों और हवा की प्रतिक्रिया: तेज़ हवा (आँधी) चलने से धूल ऐसे भाग रही है जैसे कोई ग्रामीण कन्या अपना घाघरा उठाकर भाग रही हो। पेड़ अपनी गर्दन उचकाकर बादलों को निहारने की कोशिश कर रहे हैं।
- नदी और तालाब: नदी बादलों को देखकर ठिठक गई है और अपनी तिरछी नज़र से उन्हें देख रही है (जैसे घूँघट सरकाकर कोई देख रहा हो)। तालाब खुशी से झूम उठा है और वह मेहमान के पैर धोने के लिए पानी से भरी परात लेकर आया है।
- बुजुर्ग पीपल का स्वागत: गाँव के सबसे बड़े बुजुर्ग के रूप में पीपल के पेड़ ने आगे बढ़कर मेघों का स्वागत (जुहार) किया।
- लता की व्याकुलता: किवाड़ की ओट में छिपी हुई लता (जो प्रतीकात्मक रूप से प्रतीक्षा रत पत्नी है) बादलों से शिकायत करती है कि उन्होंने पूरे एक साल बाद उसकी सुध ली है।
- मिलन का क्षण: अंत में, जब क्षितिज रूपी अटारी पर बादल गहरा गए और बिजली चमकी, तो मिलन की खुशी में आँखों से आँसू (वर्षा की बूंदें) ढलक पड़े और सारे भ्रम के बंधन टूट गए।
विशेष काव्य सौंदर्य:
- मानवीयकरण अलंकार: पूरी कविता में बादलों, पेड़ों, हवा, नदी और तालाब का मानवीयकरण किया गया है, जिससे प्रकृति सजीव हो उठी है।
- भाषा: कविता की भाषा अत्यंत सरल, सहज और आंचलिक शब्दों (जैसे पाहुन, जुहार, सुधि) से युक्त है।
- ग्रामीण संस्कृति: इसमें ग्रामीण रीति-रिवाजों और मेहमान के आने पर होने वाले उत्साह का मार्मिक चित्रण है।
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