कैदी और कोकिला
लेखक: माखनलाल चतुर्वेदी
परिचय: यह कविता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लिखी गई थी। इसमें एक स्वतंत्रता सेनानी (कवि) की मनोदशा और ब्रिटिश शासन के क्रूर अत्याचारों का मार्मिक चित्रण किया गया है। कवि जेल में अकेला और उदास है और एक कोयल (कोकिला) से संवाद कर रहा है।
कविता का विस्तृत बिंदुवार सारांश
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1. अर्धरात्रि में कोयल का आगमन
कवि जेल की ऊंची काली दीवारों के बीच कैद है। आधी रात को जब पूरा संसार सो रहा है, एक कोयल कूकने लगती है। कवि कोयल से पूछता है कि वह इस काले अंधेरे में क्यों जाग रही है? क्या वह कोई विशेष संदेश लेकर आई है या उसने किसी जंगल की आग (दावानल) को देख लिया है जो वह इतनी बेचैन होकर चीख रही है?
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2. जेल का भयावह वातावरण
कवि बताता है कि उसे डाकुओं, चोरों और बटमारों (लुटेरों) के बीच रखा गया है। जेल प्रशासन उन्हें जीने के लिए पेट भर खाना भी नहीं देता और न ही मरने देता है; वे बस तड़प कर रह जाते हैं। चारों ओर कड़ा पहरा है और जीवन पर केवल अंधेरा छाया हुआ है। चंद्रमा (हिमकर) भी निराश करके चला गया है, जिससे रात और भी काली और भयावह लग रही है।
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3. पीड़ा का बोझ और विद्रोह
कवि कोयल की आवाज़ में एक हुक (दर्द भरी पुकार) महसूस करता है। उसे लगता है कि कोयल ने अपना सब कुछ लुटते हुए देखा है। कोयल की आवाज़ 'वेदना के बोझ' जैसी भारी है। कवि को लगता है कि कोयल शायद देश को एक कारागार के रूप में देख रही है, इसलिए वह चीख रही है।
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4. हथकड़ियाँ और कोल्हू: ब्रिटिश राज का गहना
स्वतंत्रता सेनानियों के लिए हथकड़ियाँ शर्म की बात नहीं, बल्कि 'ब्रिटिश राज का गहना' हैं। जेल में कोल्हू चलाने की 'चर्ऱक चूँ' की आवाज़ को कवि अपने जीवन का संगीत मानता है। वह कहता है कि वह अपने पेट पर जुआ रखकर पानी (मोट) खींचता है, जिससे वह कुएं से पानी नहीं, बल्कि ब्रिटिश सरकार की अकड़ (अहंकार) को खाली कर रहा है।
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5. कोयल और कवि की परिस्थितियों में विषमता
कवि अपनी और कोयल की तुलना करते हुए अपनी बेबसी जाहिर करता है:
• कोयल को रहने के लिए हरी-भरी डालियाँ मिली हैं, जबकि कवि को काली कोठरी।
• कोयल पूरे आकाश में उड़ सकती है, जबकि कवि की दुनिया दस फुट की कालकोठरी में सिमटी है।
• कोयल के गीतों की लोग प्रशंसा (वाह-वाह) करते हैं, जबकि कैदी का रोना भी गुनाह माना जाता है। इस विषमता को देखकर भी कोयल युद्ध का नगाड़ा (रणभेरी) बजा रही है। -
6. 'काली' रूपक का प्रयोग
कवि 'काली' शब्द का बार-बार प्रयोग करके निराशा और अन्याय की सघनता को दर्शाता है। कोयल काली है, रात काली है, ब्रिटिश शासन की करतूतें काली हैं, और कवि की कालकोठरी, टोपी, कंबल तथा लोहे की जंजीरें सब काली हैं। इस 'काले संकट सागर' में कोयल अपने चमकीले गीतों को तैरा कर विद्रोह के बीज बो रही है।
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7. कवि का संकल्प
अंत में, कवि कोयल से पूछता है कि उसकी इस हुंकार पर वह क्या करे? वह अपनी रचनाओं के माध्यम से और क्या कर सकता है? वह मोहनदास करमचंद गांधी (मोहन) के स्वतंत्रता के व्रत को पूरा करने के लिए अपने प्राणों का रस (आसव) किसमें भर दे? कवि देश की आजादी के लिए पूरी तरह समर्पित है।
यह सारांश 'क्षितिज' पाठ्यपुस्तक के 'कैदी और कोकिला' पाठ पर आधारित है।