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ललद्यद (वाख)

कवयित्री परिचय: ललद्यद

  • जीवन काल: ललद्यद कश्मीर की लोकप्रिय संत-कवयित्री थीं। उनका जन्म लगभग 1320 ई. में कश्मीर के पाम्पोर के 'सिमपुरा' गाँव में हुआ और देहांत 1391 ई. के आसपास हुआ।
  • अन्य नाम: उन्हें लल्लेश्वरी, लला, ललयोगेश्वरी और ललारिफ़ा जैसे नामों से भी जाना जाता है।
  • काव्य शैली: उनकी रचनाओं को 'वाख' कहा जाता है। जिस तरह हिंदी में कबीर के दोहे और मीरा के पद प्रसिद्ध हैं, उसी तरह कश्मीरी साहित्य में ललद्यद के 'वाख' प्रसिद्ध हैं।
  • भाषा: उन्होंने संस्कृत और फारसी के कठिन शब्दों के बजाय आम जनता की सरल कश्मीरी भाषा का प्रयोग किया, जिससे उनकी रचनाएँ आज भी कश्मीरी लोगों की जुबान पर हैं।
  • विचारधारा: उन्होंने धर्म और जाति की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर जीवन से जुड़ी भक्ति और प्रेम को ही सबसे बड़ा मूल्य बताया।

वाखों का विस्तृत बिंदुवार सारांश

1. ईश्वर प्राप्ति की तड़प और जीवन की नश्वरता

  • कवयित्री अपने जीवन को एक नाव मानती हैं जिसे वह साँसों रूपी 'कच्चे धागे' की रस्सी से खींच रही हैं। यह जीवन अत्यंत नाशवान और कमजोर है।
  • जिस प्रकार कच्ची मिट्टी के बर्तन (सकोरे) से पानी टपकता रहता है, उसी प्रकार उनके जीवन का समय बीतता जा रहा है और ईश्वर प्राप्ति के सारे प्रयास व्यर्थ हो रहे हैं।
  • उनके मन में बार-बार एक ही पीड़ा (हूक) उठती है और उन्हें अपने असली घर (परमात्मा के पास) जाने की तीव्र इच्छा घेरे हुए है।

2. बाह्याडंबर का विरोध और समभाव

  • ललद्यद कहती हैं कि केवल भोग-विलास में लिप्त रहने से कुछ हासिल नहीं होगा।
  • दूसरी ओर, यदि मनुष्य सब कुछ त्याग कर व्रत-तपस्या करता है, तो उससे मन में अहंकार (घमंड) पैदा होता है कि 'मैं बड़ा त्यागी हूँ'।
  • सही मार्ग 'मध्यम मार्ग' है। जब व्यक्ति 'सम' खाएगा (इंद्रियों का निग्रह करेगा और समानता का भाव रखेगा), तभी उसकी चेतना व्यापक होगी और अज्ञानता के बंद द्वार की सांकल खुलेगी।

3. आत्मलोचन और सत्कर्मों का महत्व

  • कवयित्री अफसोस जताती हैं कि वह इस दुनिया में आईं तो सीधे रास्ते से थीं (ईश्वर से पवित्र रूप में), लेकिन जीवन भर दुनियादारी और हठयोग ('सुषुम्ना-सेतु') के चक्कर में भटकती रहीं।
  • जब जीवन का अंत समय आया और उन्होंने अपनी 'जेब टटोली' (आत्म-विश्लेषण किया), तो पाया कि उनके पास ईश्वर रूपी मांझी को 'उतराई' (किराया) देने के लिए कोई सत्कर्म (कौड़ी) नहीं था।
  • भाव यह है कि भवसागर पार करने के लिए केवल अच्छे कर्म ही सहायक होते हैं, जो उन्होंने नहीं कमाए।

4. ईश्वर की सर्वव्यापकता और भेद-भाव का खंडन

  • ईश्वर (शिव) थल-थल में, यानी कण-कण में बसता है।
  • कवयित्री संदेश देती हैं कि हिंदू और मुसलमान में भेद करना व्यर्थ है क्योंकि ईश्वर सभी में समान रूप से विद्यमान है।
  • सच्चा ज्ञानी वही है जो 'स्वयं को जाने'। आत्मज्ञान ही ईश्वर की सच्ची पहचान है। जब मनुष्य खुद को जान लेता है, तो वह अपने स्वामी (ईश्वर) को भी पहचान लेता है।
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