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साँवले सपनों की याद

लेखक: जाकिर हुसैन
परिचय: यह पाठ जून 1987 में प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली की मृत्यु के तुरंत बाद लिखा गया एक संस्मरण है। इसमें लेखक ने सालिम अली के व्यक्तित्व और प्रकृति के प्रति उनके प्रेम को डायरी शैली में व्यक्त किया है।

  • 1. सालिम अली की अंतिम यात्रा लेखक वर्णन करते हैं कि सुनहरे पक्षियों के पंखों पर सवार 'साँवले सपनों' का एक हुजूम मौत की खामोश वादी की ओर बढ़ रहा है। इस भीड़ में सबसे आगे सालिम अली हैं। यह उनका आखिरी सफर है। वे भीड़-भाड़ वाली जिंदगी और तनाव के माहौल से दूर, उस वन-पक्षी की तरह प्रकृति में विलीन हो रहे हैं जो अपना आखिरी गीत गाने के बाद मौत की गोद में जा बसा हो। अब कोई अपने दिल की धड़कन देकर भी उन्हें वापस नहीं ला सकता।
  • 2. प्रकृति के प्रति नजरिया सालिम अली का मानना था कि लोग पक्षियों को आदमी की नजर से देखना चाहते हैं, जो कि उनकी भूल है। ठीक उसी तरह जैसे लोग जंगलों, पहाड़ों और झरनों को प्रकृति की नजर से नहीं, बल्कि अपनी नजर से देखते हैं। कोई भी आदमी पक्षियों की मधुर आवाज सुनकर अपने भीतर रोमांच महसूस नहीं कर सकता अगर वह उनसे आत्मीयता न रखे। सालिम अली इसी रोमांच और अनुभव के अवतार थे।
  • 3. वृंदावन और कृष्ण की याद लेखक एक उदाहरण देते हैं कि इतिहास में कब कृष्ण ने वृंदावन में रासलीला रची थी और बांसुरी बजाई थी, यह किसी को ठीक से याद नहीं। लेकिन आज भी जब कोई वृंदावन जाता है और यमुना का साँवला पानी देखता है, तो उसे लगता है कि अभी कोई अचानक आकर बंसी बजाएगा और संगीत का जादू पूरी वाटिका पर छा जाएगा। वृंदावन कभी कृष्ण की बांसुरी के जादू से खाली नहीं हुआ। उसी प्रकार, सालिम अली को भी पक्षियों की दुनिया से अलग नहीं किया जा सकता।
  • 4. सालिम अली का व्यक्तित्व सालिम अली एक कमजोर काया वाले व्यक्ति थे, जिनकी उम्र सौ वर्ष होने में कुछ ही दिन शेष थे। लंबी यात्राओं की थकान ने उनके शरीर को कमजोर कर दिया था और शायद कैंसर जैसी बीमारी उनकी मौत का कारण बनी। लेकिन अंतिम समय तक उनकी आंखों की रोशनी पक्षियों की तलाश और उनकी हिफाजत के प्रति समर्पित रही। उनकी आंखों पर चढ़ी दूरबीन उनकी मौत के बाद ही उतरी थी।
  • 5. 'बर्ड वाचर' के रूप में जीवन उन जैसा 'बर्ड वाचर' शायद ही कोई हुआ हो। वे उन लोगों में से थे जो प्रकृति के प्रभाव में आने के बजाय, प्रकृति को अपने प्रभाव में लाने के कायल थे। उनके लिए प्रकृति में हर तरफ एक रहस्य भरी दुनिया पसरी थी, जिसे उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से गढ़ा था। इस काम में उनकी जीवनसाथी तहमीना ने उनकी काफी मदद की थी।
  • 6. प्रधानमंत्री से मुलाकात और पर्यावरण चिंता सालिम अली पर्यावरण के प्रति अत्यंत सजग थे। एक बार वे केरल की 'साइलेंट वैली' को रेगिस्तानी हवा के झोंकों से बचाने का अनुरोध लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह से मिले थे। चौधरी साहब गांव की मिट्टी से जुड़े नेता थे, इसलिए सालिम अली द्वारा बताए गए पर्यावरण के खतरों को सुनकर उनकी आंखें नम हो गई थीं।
  • 7. डी.एच. लॉरेंस और गौरैया लेखक अंग्रेजी उपन्यासकार डी.एच. लॉरेंस का जिक्र करते हैं, जो प्रकृति से गहरा प्रेम करते थे। उनकी मृत्यु के बाद जब उनकी पत्नी फ्रीडा से लॉरेंस के बारे में कुछ लिखने को कहा गया, तो उन्होंने कहा, "मेरी छत पर बैठने वाली गौरैया लॉरेंस के बारे में ढेर सारी बातें जानती है।" यह दर्शाता है कि सालिम अली और लॉरेंस जैसे लोग प्रकृति के साथ कितना गहरा और खुला संबंध रखते थे।
  • 8. जीवन की दिशा बदलने वाली घटना बचपन में एक बार सालिम अली की एयरगन से एक नीले कंठ वाली गौरैया घायल होकर गिर पड़ी थी। इस घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वे उस गौरैया की देखभाल और खोजबीन में लग गए और पूरी जिंदगी पक्षियों की खोज के नए-नए रास्तों पर चलते रहे। उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम भी 'फॉल ऑफ अ स्पैरो' (Fall of a Sparrow) रखा।
  • 9. अथाह सागर जैसा व्यक्तित्व सालिम अली प्रकृति की दुनिया में एक टापू बनने के बजाय अथाह सागर बनकर उभरे थे। वे एक जगह सिमट कर रहने वाले नहीं थे, बल्कि उनका स्वभाव भ्रमणशील था।
  • 10. निष्कर्ष: एक अंतहीन प्रतीक्षा जो लोग उनके स्वभाव को जानते हैं, उन्हें आज भी लगता है कि सालिम अली बस पक्षियों का सुराग लगाने निकले हैं और अभी गले में दूरबीन लटकाए वापस आ जाएंगे। लेखक अंत में भावुक होकर पूछते हैं - "सालिम अली, तुम लौटोगे न?"
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