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बच्चे काम पर जा रहे हैं - राजेश जोशी

कवि परिचय: राजेश जोशी

  • जन्म: राजेश जोशी का जन्म सन 1946 में मध्य प्रदेश के नरसिंहगढ़ जिले में हुआ।
  • कार्यक्षेत्र: शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता और अध्यापन का कार्य किया। उन्होंने कहानियाँ, नाटक, लेख और टिप्पणियाँ भी लिखी हैं।
  • साहित्यिक योगदान: उन्होंने 'भर्तृहरि' की कविताओं और 'मायकोवस्की' की रचनाओं का अनुवाद भी किया है। उनकी रचनाएँ अंग्रेजी, रूसी और जर्मन भाषा में भी अनूदित हुई हैं।
  • प्रमुख काव्य-संग्रह: 'एक दिन बोलेंगे पेड़', 'मिट्टी का चेहरा', 'नेपथ्य में हँसी' और 'दो पंक्तियों के बीच' उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं।
  • सम्मान: उन्हें माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का शिखर सम्मान और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

कविता का मुख्य भाव और सारांश

प्रस्तुत कविता में बच्चों से उनका बचपन छीने जाने की गहरी पीड़ा व्यक्त की गई है। कवि ने उस सामाजिक-आर्थिक विडंबना की ओर संकेत किया है, जिसमें गरीबी और अभाव के कारण बच्चे खेल, शिक्षा और जीवन के उत्साह से वंचित रह जाते हैं।

  • भयानक वास्तविकता: कड़कड़ाती ठंड और कोहरे से ढकी सड़क पर सुबह-सुबह बच्चों का काम पर जाना हमारे समय की सबसे भयानक वास्तविकता है।
  • सवाल के रूप में प्रस्तुति: कवि के अनुसार, बच्चों का काम पर जाना एक साधारण विवरण की तरह नहीं, बल्कि एक गंभीर प्रश्न के रूप में पूछा जाना चाहिए कि "बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं?"
  • बचपन की वस्तुओं का अभाव: कवि पूछता है कि क्या बच्चों की सारी गेंदें अंतरिक्ष में गिर गई हैं? क्या उनकी रंग-बिरंगी किताबों को दीमक खा गई हैं? क्या उनके खिलौने किसी पहाड़ के नीचे दब गए हैं या उनके स्कूल भूकंप में नष्ट हो गए हैं?
  • संवेदनहीनता पर प्रहार: दुनिया में खेल के मैदान, बगीचे और घरों के आँगन जैसे सब कुछ पहले की तरह मौजूद हैं, फिर भी छोटे-छोटे बच्चों का काम पर जाना समाज की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
  • सबसे बड़ा खतरा: कवि का मानना है कि यदि बच्चों का बचपन ही नहीं बचा, तो इस दुनिया में रहने का कोई अर्थ नहीं रह जाता। बच्चों का काम पर जाना धरती के एक बड़े हादसे के समान है।

संवैधानिक और महत्वपूर्ण तथ्य

  • अनुच्छेद 24: भारतीय संविधान के अनुसार, 14 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे को कारखाने, खान या किसी अन्य खतरनाक काम में नियोजित नहीं किया जा सकता।
  • सामाजिक संदेश: यह कविता बाल श्रम की रोकथाम और हर बच्चे के लिए खेल एवं शिक्षा के समान अवसर सुनिश्चित करने की वकालत करती है।
  • शब्दावली:
    • कोहरा: धुंध
    • मदरसा: विद्यालय
    • हसबमामूल: यथावत (जैसा होना चाहिए वैसा ही)

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