रसखान (सवैये)
प्रश्न-अभ्यास
1. ब्रजभूमि के प्रति कवि का प्रेम किन-किन रूपों में अभिव्यक्त हुआ है?
उत्तर: कवि रसखान का ब्रजभूमि के प्रति प्रेम अनेक रूपों में अभिव्यक्त हुआ है:
1. मनुष्य रूप में: वे अगले जन्म में गोकुल गाँव का ग्वाला बनना चाहते हैं।
2. पशु रूप में: वे नंद बाबा की गायों के बीच चरने वाला पशु बनना चाहते हैं।
3. पत्थर रूप में: वे उसी गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनना चाहते हैं जिसे कृष्ण ने अपनी उंगली पर उठाया था।
4. पक्षी रूप में: वे यमुना किनारे कदंब की डालों पर बसेरा करने वाला पक्षी बनना चाहते हैं।
[cite_start]कवि हर हाल में ब्रजभूमि में ही रहना चाहते हैं। [cite: 688, 689, 690, 691]
2. कवि का ब्रज के वन, बाग और तालाब को निहारने के पीछे क्या कारण हैं?
उत्तर: कवि रसखान कृष्ण के अनन्य भक्त हैं। ब्रज के वन, बाग और तालाबों से श्री कृष्ण का गहरा संबंध रहा है। इन स्थानों पर कृष्ण ने अपनी बाल लीलाएँ की थीं। इसलिए, कवि इन स्थानों को निहारकर अपने आराध्य (कृष्ण) की स्मृतियों और सान्निध्य का सुख अनुभव करना चाहते हैं। [cite_start]उनके लिए ये स्थान केवल प्रकृति नहीं, बल्कि कृष्ण-प्रेम के प्रतीक हैं। [cite: 694]
3. एक लकुटी और कामरिया पर कवि सब कुछ न्योछावर करने को क्यों तैयार है?
उत्तर: कवि के लिए कृष्ण से जुड़ी हर वस्तु अमूल्य है। 'लकुटी' (लाठी) और 'कामरिया' (कंबल) वही वस्तुएँ हैं जिन्हें लेकर कृष्ण गाय चराने जाते थे। इन वस्तुओं के साथ कृष्ण का स्पर्श और यादें जुड़ी हैं। [cite_start]इसलिए, कवि इन तुच्छ दिखने वाली वस्तुओं के सुख के आगे तीनों लोकों के राज-पाठ को भी त्यागने (न्योछावर करने) को तैयार हैं क्योंकि इनमें जो आत्मीय सुख है, वह राज-पाट में नहीं है। [cite: 692]
4. सखी ने गोपी से कृष्ण का कैसा रूप धारण करने का आग्रह किया था? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
उत्तर: सखी ने गोपी से आग्रह किया था कि वह कृष्ण का पूरा स्वाँग (वेश) रचे। उसने कहा कि वह:
1. सिर पर मोरपंख का मुकुट धारण करे।
2. गले में गुंजों (वनमाला) की माला पहने।
3. शरीर पर पीला वस्त्र (पीतांबर) ओढ़े।
4. हाथ में लाठी (लकुटी) लेकर ग्वालों और गायों (गोधन) के संग वन-वन फिरे।
[cite_start]सखी चाहती थी कि गोपी कृष्ण का वह रूप बनाए जो उसे बहुत प्रिय (भावतो) लगता है। [cite: 696, 697]
5. आपके विचार से कवि पशु, पक्षी और पहाड़ के रूप में भी कृष्ण का सान्निध्य क्यों प्राप्त करना चाहता है?
उत्तर: मेरे विचार से कवि रसखान की कृष्ण के प्रति भक्ति इतनी गहरी है कि वे किसी भी स्थिति में अपने आराध्य से दूर नहीं होना चाहते। उन्हें मोक्ष या स्वर्ग की चाह नहीं है, बल्कि वे जन्म-जन्मांतर तक ब्रजभूमि में ही रहना चाहते हैं। [cite_start]चाहे योनि (जन्म) कोई भी मिले—पशु, पक्षी या जड़ पत्थर—वे हर रूप में कृष्ण की लीला-स्थली के समीप रहकर उनका सान्निध्य और प्रेम महसूस करना चाहते हैं। [cite: 688, 689, 690, 691]
6. चौथे सवैये के अनुसार गोपियाँ अपने आप को क्यों विवश पाती हैं?
उत्तर: चौथे सवैये के अनुसार, गोपियाँ श्री कृष्ण की मुरली की मधुर धुन और उनकी आकर्षक मुसकान के आगे विवश हो जाती हैं। जब कृष्ण मुरली बजाते हैं या मुस्कुराते हैं, तो गोपियाँ अपना मानसिक संतुलन खो बैठती हैं और लोक-लाज भूलकर उनकी ओर खिंची चली जाती हैं। [cite_start]वे चाहकर भी अपने हृदय को संभाल नहीं पातीं ("सम्हारी न जैहै"), इसलिए वे स्वयं को विवश महसूस करती हैं। [cite: 698, 699, 700]
7. भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।
(ख) माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै।
उत्तर:
(क) कोटिक ए कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।
भाव: इसका भाव यह है कि कवि रसखान ब्रज की कांटेदार झाड़ियों (करील के कुंजन) को सोने के करोड़ों महलों (कलधौत के धाम) से भी अधिक मूल्यवान मानते हैं। वे कृष्ण की लीला-भूमि ब्रज की इन झाड़ियों में रहने के सुख के लिए सोने के महलों का सुख भी न्योछावर करने को तैयार हैं। [cite_start]अर्थात, कृष्ण-प्रेम के आगे सांसारिक वैभव तुच्छ है। [cite: 695]
(ख) माइ री वा मुख की मुसकानि सम्हारी न जैहै, न जैहै, न जैहै।
भाव: इसका भाव यह है कि कृष्ण की मुसकान इतनी सम्मोहक और प्रभावशाली है कि उसे देखकर गोपी अपने आप पर काबू नहीं रख पाती। वह अपनी माँ (या सखी) से कहती है कि उस मुसकान का जादू इतना तीव्र है कि उससे अपना मन संभाला ही नहीं जाता। [cite_start]'न जैहै' की आवृत्ति गोपी की विवशता और कृष्ण-प्रेम की तीव्रता को दर्शाती है। [cite: 700]
8. 'कालिंदी कूल कदंब की डारन' में कौन-सा अलंकार है?
[cite_start]उत्तर: इस पंक्ति में 'क' वर्ण की आवृत्ति बार-बार (कालिंदी, कूल, कदंब) हुई है, इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है। [cite: 691]
9. काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी।
उत्तर:
भाव सौंदर्य: इसमें गोपी का कृष्ण के प्रति प्रेम और मुरली (बाँसुरी) के प्रति सौतिया डाह (ईर्ष्या) का भाव व्यक्त हुआ है। गोपी कृष्ण का वेश तो धारण करने को तैयार है, लेकिन वह उस मुरली को अपने होठों से नहीं लगाना चाहती क्योंकि उसे लगता है कि मुरली ने ही कृष्ण को उससे दूर किया है।
शिल्प सौंदर्य:
1. यमक अलंकार:
- 'मुरलीधर' = मुरली को धारण करने वाले (कृष्ण)।
- 'अधरान' = होठों पर।
- 'अधरा न' = होठों पर नहीं।
यहाँ शब्दों की आवृत्ति और भिन्न अर्थों के कारण यमक अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
2. अनुप्रास अलंकार: 'म' और 'ध' वर्णों की आवृत्ति से नाद-सौंदर्य बढ़ा है।
3. [cite_start]भाषा: मधुर ब्रजभाषा का प्रयोग है। [cite: 697]
रचना और अभिव्यक्ति
10. प्रस्तुत सवैयों में जिस प्रकार ब्रजभूमि के प्रति प्रेम अभिव्यक्त हुआ है, उसी तरह आप अपनी मातृभूमि के प्रति अपने मनोभावों को अभिव्यक्त कीजिए।
उत्तर: (यह विद्यार्थी का अपना विचार हो सकता है, एक उदाहरण नीचे दिया गया है)
जिस प्रकार रसखान को ब्रजभूमि से प्रेम है, उसी प्रकार मुझे अपनी मातृभूमि भारत से अगाध प्रेम है। यह वह धरती है जहाँ मैंने जन्म लिया, जिसकी मिट्टी में खेलकर मैं बड़ा हुआ और जिसके अन्न-जल से मेरा पोषण हुआ। मैं चाहता हूँ कि मेरा जीवन देश के काम आए। इसकी संस्कृति, नदियाँ और हरियाली मुझे शांति देती है। यदि मुझे दोबारा जन्म मिले, तो मैं इसी पुण्यधरा पर जन्म लेना चाहूँगा और इसकी सेवा करना चाहूँगा। मुझे अपनी मातृभूमि पर गर्व है।
11. रसखान के इन सवैयों का शिक्षक की सहायता से कक्षा में आदर्श वाचन कीजिए। साथ ही किन्हीं दो सवैयों को कंठस्थ कीजिए।
उत्तर: यह कार्य विद्यार्थी कक्षा में अपने शिक्षक के मार्गदर्शन में करें।
संकेत: आप पहले और दूसरे सवैये (मानुष हौं तो... और या लकुटी अरु...) को आसानी से कंठस्थ (याद) कर सकते हैं क्योंकि इनमें लयात्मकता अधिक है।