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यशपाल : लखनवी अंदाज़
लेखक का परिचय और यात्रा का उद्देश्य
- लेखक यशपाल ने भीड़ से बचने और एकांत में नई कहानी के बारे में सोचने के लिए 'सेकंड क्लास' का टिकट खरीदा।
- उन्हें लगा कि डिब्बा खाली होगा, जिससे वे खिड़की से प्राकृतिक दृश्य भी देख सकेंगे।
- गाड़ी चलने वाली थी, इसलिए वे दौड़कर एक डिब्बे में चढ़ गए।
डिब्बे का दृश्य और नवाब साहब
- डिब्बा खाली नहीं था। वहां पहले से ही लखनऊ की नवाबी नस्ल के एक सज्जन (नवाब साहब) पालथी मारे बैठे थे।
- उनके सामने तौलिये पर दो ताजे और चिकने खीरे रखे हुए थे।
- लेखक के अचानक आ जाने से नवाब साहब की आँखों में असंतोष दिखाई दिया, मानो उनके एकांत चिंतन में विघ्न पड़ गया हो।
- नवाब साहब ने लेखक से कोई बातचीत नहीं की और न ही कोई उत्साह दिखाया। लेखक ने भी आत्मसम्मान में उनसे नज़रें चुरा लीं।
लेखक का अनुमान
- लेखक सोचने लगे कि शायद नवाब साहब ने किफायत (बचत) के विचार से सेकंड क्लास का टिकट लिया होगा, लेकिन अब उन्हें यह अच्छा नहीं लग रहा कि कोई उन्हें सामान्य दर्जे में सफर करते देखे।
- अकेले सफर का वक्त काटने के लिए उन्होंने खीरे खरीदे होंगे, लेकिन अब किसी 'सफेदपोश' (भद्र व्यक्ति) के सामने खीरा खाने में उन्हें संकोच हो रहा था।
नवाब साहब की तैयारी और खीरे की पेशकश
- कुछ देर बाद नवाब साहब ने लेखक को संबोधित किया और खीरे का शौक फरमाने का आग्रह किया ("आदाब-अर्ज")।
- लेखक ने उनके अचानक बदले भाव को देखा लेकिन स्वाभिमान बनाए रखने के लिए "शुक्रिया, किबला शौक फरमाएं" कहकर मना कर दिया।
- नवाब साहब ने बहुत ही व्यवस्थित ढंग से खीरे खाने की तैयारी की:
- उन्होंने खीरों को खिड़की से बाहर धोया और तौलिये से पोंछा।
- चाकू निकालकर खीरों के सिर काटे और गोदकर उनका कड़वापन (झाग) निकाला।
- खीरों को बहुत एहतियात से छीलकर उनकी फाँकों को करीने से तौलिये पर सजाया।
- फाँकों पर जीरा-मिला नमक और लाल मिर्च बुरक दी।
- नवाब साहब के मुंह में खीरे के रसास्वादन की कल्पना से पानी आ रहा था।
बिना खाए रसास्वादन (सूक्ष्म तरीका)
- नमक-मिर्च लगी फाँकों को देखकर लेखक के मुंह में भी पानी आ गया था, लेकिन वे एक बार मना कर चुके थे, इसलिए दूसरी बार पूछने पर उन्होंने "मेदा (पेट) कमजोर" होने का बहाना बना दिया।
- इसके बाद नवाब साहब ने एक अनोखा तरीका अपनाया:
- उन्होंने खीरे की एक फाँक उठाई, उसे होठों तक ले गए और सूँघा।
- स्वाद के आनंद में उनकी पलकें मुंद गईं।
- मुंह में आए पानी को गले से नीचे उतारा।
- फिर उस फाँक को बिना खाए खिड़की से बाहर फेंक दिया।
- नवाब साहब ने एक-एक करके सभी फाँकों को सूँघा और बाहर फेंक दिया।
- अंत में उन्होंने तौलिये से हाथ और होंठ पोंछे और गर्व से लेखक की ओर देखा, मानो कह रहे हों—यह है खानदानी रईसों का तरीका।
निष्कर्ष और व्यंग्य
- नवाब साहब ने लेटे-लेटे भरे पेट जैसी डकार ली और बोले, "खीरा लजीज होता है, लेकिन पेट पर बोझ डाल देता है।"
- लेखक के ज्ञान-चक्षु खुल गए। उन्होंने सोचा कि अगर खीरे की सुगंध और कल्पना मात्र से पेट भरने की डकार आ सकती है, तो बिना विचार, घटना और पात्रों के, केवल लेखक की इच्छा से 'नई कहानी' क्यों नहीं बन सकती?
- यह कहानी दिखावे की संस्कृति (पतनशील सामंती वर्ग) पर व्यंग्य करती है जो वास्तविकता से दूर एक बनावटी जीवन शैली जी रहे हैं।
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