Quick Navigation:
| | |
Quick Navigation:
| | |
यतीन्द्र मिश्र : नौबतखाने में इबादत
लेखक: यतीन्द्र मिश्र
मुख्य चरित्र: उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ (अमीरुद्दीन)
विषय: यह पाठ प्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्ला खाँ के जीवन, उनकी सादगी, संगीत साधना और काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति का सजीव चित्रण है।
1. प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
- उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म बिहार के डुमराँव में एक संगीत प्रेमी परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम अमीरुद्दीन था।
- उनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ और पिता पैगंबर बख्श खाँ भी डुमराँव के प्रसिद्ध शहनाई वादक थे।
- मात्र 6 वर्ष की आयु में वे अपने ननिहाल (नाना का घर) काशी (वाराणसी) आ गए थे।
- काशी में उनके मामा सादिक हुसैन और अलीबख्श प्रसिद्ध शहनाई वादक थे, जो बालाजी मंदिर की ड्योढ़ी पर शहनाई बजाते थे।
2. शहनाई और डुमराँव का संबंध
- शहनाई बजाने के लिए जिस 'रीड' (Narkat) का प्रयोग होता है, वह एक प्रकार की घास 'नरकट' से बनती है।
- यह नरकट घास मुख्य रूप से डुमराँव में सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। इसलिए शहनाई की दुनिया में डुमराँव का विशेष महत्व है।
3. संगीत की प्रेरणा और अभ्यास (रियाज़)
- बिस्मिल्ला खाँ को बचपन में बालाजी मंदिर जाने के रास्ते में रसूलन बाई और बतूलन बाई (गायिकाओं) के गायन से संगीत की प्रेरणा मिली।
- वे 14 साल की उम्र से ही बालाजी मंदिर के नौबतखाने में रियाज़ करने जाते थे।
- उनके लिए शहनाई केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम थी।
4. शहनाई का इतिहास और महत्व
- वैदिक इतिहास में शहनाई का उल्लेख नहीं मिलता। इसे 'सुषिर-वाद्य' (फूँक कर बजाए जाने वाले वाद्य) में गिना जाता है।
- अरब देशों में फूँक कर बजाए जाने वाले वाद्य को 'नय' कहते हैं। शहनाई को 'शाह-ने' (सुषिर वाद्यों में शाह/राजा) की उपाधि दी गई है।
- यह एक मंगल वाद्य है जिसे मांगलिक अवसरों पर बजाया जाता है।
5. मुहर्रम और धार्मिक उदारता
- बिस्मिल्ला खाँ और उनका परिवार शिया मुसलमान था और मुहर्रम के प्रति गहरी आस्था रखता था।
- मुहर्रम के दस दिनों तक उनके खानदान में कोई शहनाई नहीं बजाता था और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में भाग लेता था।
- मुहर्रम की आठवीं तारीख को वे दालमंडी से फातमान तक (करीब 8 किमी) पैदल रोते हुए और शोक धुन (नौहा) बजाते हुए जाते थे।
6. काशी और विश्वनाथ के प्रति प्रेम
- खाँ साहब के लिए काशी और शहनाई जन्नत से बढ़कर थी।
- वे कहते थे, "मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी, न काशी।"
- वे जब भी काशी से बाहर रहते, तो काशी विश्वनाथ और बालाजी मंदिर की दिशा में मुँह करके थोड़ी देर शहनाई जरूर बजाते थे।
- उनके लिए गंगा मैया और बाबा विश्वनाथ का स्थान सर्वोच्च था।
7. सादगी और व्यक्तित्व
- इतने महान कलाकार और 'भारत रत्न' मिलने के बाद भी वे बेहद सादा जीवन जीते थे। वे अक्सर फटी हुई लुंगी में मिलते थे।
- जब एक शिष्या ने उन्हें फटी लुंगी न पहनने को कहा, तो उन्होंने जवाब दिया: "भारत रत्न हमको शहनाई पे मिला है, लुंगिया पे नहीं।"
- वे खुदा से हमेशा 'सच्चे सुर' की दुआ मांगते थे, धन-दौलत की नहीं। वे पाँचों वक्त की नमाज में यही प्रार्थना करते कि उन्हें सुर का वरदान मिले।
8. खान-पान और शौक
- बचपन में उन्हें फिल्मों का बहुत शौक था। वे अपनी कमाई से 'सुलोचना' (अभिनेत्री) की फिल्में देखने जाते थे।
- उन्हें कुलसुम हलवाइन की दुकान की 'कचौड़ी' बहुत पसंद थी। वे कचौड़ी तलने की आवाज़ में भी संगीत (आरोह-अवरोह) ढूँढ लेते थे।
9. निष्कर्ष और विरासत
- बिस्मिल्ला खाँ काशी की साझा संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) के प्रतीक थे।
- 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
- उन्होंने 80 वर्षों तक संगीत को संपूर्णता और एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को जीवित रखा। वे संगीत के नायक के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे।
(स्रोत: एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक - क्षितिज भाग-2, पाठ: नौबतखाने में इबादत)
Quick Navigation:
| | |
1 / 1
Quick Navigation:
| | |