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जयशंकर प्रसाद : आत्मकथ्य

1. कवि परिचय (जयशंकर प्रसाद)

  • जन्म और शिक्षा: जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 1889 में वाराणसी में हुआ। उनकी औपचारिक शिक्षा आठवीं तक क्वींस कॉलेज में हुई, परंतु घर पर ही उन्होंने संस्कृत, हिंदी और फारसी का गहन अध्ययन किया।
  • साहित्यिक योगदान: वे छायावादी काव्य प्रवृत्ति के प्रमुख कवियों में से एक थे। उनकी प्रमुख रचनाओं में कामायनी (महाकाव्य), आँसू, लहर और झरना शामिल हैं।
  • बहुमुखी प्रतिभा: वे न केवल कवि थे बल्कि एक सफल नाटककार (चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी) और उपन्यासकार (कंकाल, तितली, इरावती) भी थे।
  • मृत्यु: सन् 1937 में उनका निधन हो गया।

2. कविता की पृष्ठभूमि

  • मुंशी प्रेमचंद के संपादन में 'हंस' पत्रिका का एक 'आत्मकथा विशेषांक' निकलना तय हुआ था।
  • प्रसाद जी के मित्रों ने आग्रह किया कि वे भी अपनी आत्मकथा लिखें, लेकिन प्रसाद जी इससे सहमत नहीं थे।
  • इसी असहमति और तर्क से यह कविता 'आत्मकथ्य' पैदा हुई, जो पहली बार 1932 में प्रकाशित हुई।

3. कविता का विस्तृत सारांश

  • जीवन की नश्वरता:
    कवि अपने मन रूपी भँवरे (मधुप) के माध्यम से कहता है कि जीवन की कहानी दुखों से भरी है। जिस प्रकार पेड़ की पत्तियाँ मुरझाकर गिर जाती हैं, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी नश्वर है और खुशियाँ स्थायी नहीं हैं।
  • निराशा और व्यंग्य:
    इस अनंत नीले आकाश के नीचे अनगिनत जीवन-इतिहास (जीवनियाँ) लिखे गए हैं, लेकिन उन्हें पढ़कर ऐसा लगता है जैसे लोग अपनी ही कमजोरियों और बुराइयों का मजाक उड़ा रहे हों। कवि नहीं चाहता कि वह अपनी आत्मकथा लिखकर खुद को दुनिया के व्यंग्य का पात्र बनाए।
  • जीवन की रिक्तता (खाली गागर):
    कवि अपने जीवन को एक 'खाली गागर' के समान मानता है, जिसमें सुख और उपलब्धियों का अभाव है। वह पाठकों से पूछता है कि क्या वे उसकी खाली और दुखभरी गागर को देखकर सच में सुख पाएंगे?
  • सरलता का उपहास नहीं:
    कवि अपनी 'सरलता' को ही अपनी कमी मानता है। वह कहता है कि उसने जीवन में धोखे खाए हैं (प्रवंचना), लेकिन वह अपनी गलतियों या दूसरों के छल को उजागर करके अपनी सरलता का मजाक नहीं उड़वाना चाहता।
  • निजी प्रेम और सुखद स्मृतियाँ:
    कवि के जीवन में कुछ सुखद क्षण भी आए थे (मधुर चांदनी रातें, खिलखिलाकर हँसना), जो प्रेम से भरे थे। वह इन निजी पलों को 'उज्ज्वल गाथा' कहता है और उन्हें किसी के साथ साझा नहीं करना चाहता।
  • अधूरा सपना:
    कवि का सुख एक सपने की तरह था, जो पूरा होने से पहले ही टूट गया। सुख उसके पास आते-आते (आलिंगन में) मुस्कुराकर भाग गया। उसकी प्रेमिका के गालों की लालिमा (अरुण-कपोल) उषा की लालिमा से भी सुंदर थी, लेकिन वह अब केवल एक याद बनकर रह गई है।
  • स्मृतियाँ ही सहारा (पाथेय):
    अब कवि के थके हुए जीवन रूपी यात्री के लिए वे पुरानी यादें ही 'पाथेय' (रास्ते का भोजन/सहारा) हैं। वह अपने जीवन की गुदड़ी (कंथा) की सिलाई उधेड़कर दूसरों को अपने पुराने दर्द नहीं दिखाना चाहता।
  • कवि की विनम्रता और मौन:
    जयशंकर प्रसाद अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि उनका जीवन एक "छोटे से व्यक्ति" का जीवन है और उनकी कोई "बड़ी कथाएं" नहीं हैं। इसलिए, वे अपनी कहानी सुनाने के बजाय दूसरों की कहानी सुनना और मौन रहना बेहतर समझते हैं।

निष्कर्ष

कविता के अंत में कवि कहता है कि "अभी समय भी नहीं" है। उसकी पीड़ा और व्यथा थककर सोई हुई है। वह उसे जगाना नहीं चाहता। यह कविता छायावादी शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें कवि ने अपनी असहमति को अत्यंत कलात्मक, प्रतीकात्मक और भावनात्मक ढंग से व्यक्त किया है।

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