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स्वयं प्रकाश : नेताजी का चश्मा

लेखक: स्वयं प्रकाश
यह कहानी देशभक्ति की भावना और देश के निर्माण में आम नागरिकों, यहाँ तक कि बच्चों के योगदान को भी रेखांकित करती है।

1. हालदार साहब और कस्बे का परिचय

  • हालदार साहब को कंपनी के काम के सिलसिले में हर पंद्रहवें दिन एक छोटे से कस्बे से गुजरना पड़ता था।
  • कस्बे में कुछ पक्के मकान, एक छोटा बाजार, लड़कों और लड़कियों का एक-एक स्कूल, एक सीमेंट का कारखाना और दो ओपन एयर सिनेमाघर थे।
  • कस्बे की नगरपालिका अक्सर कुछ न कुछ काम करवाती रहती थी। इसी नगरपालिका के किसी उत्साही अधिकारी ने मुख्य बाजार के चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी।

2. मूर्ति और चश्मे का रहस्य

  • मूर्ति बनाने का काम कस्बे के हाई स्कूल के इकलौते ड्राइंग मास्टर, मोतीलाल जी को सौंपा गया था, जिन्होंने महीने भर में मूर्ति बनाकर तैयार कर दी।
  • नेताजी की मूर्ति फौजी वर्दी में सुंदर और मासूम लग रही थी, जिसे देखते ही 'दिल्ली चलो' जैसे नारे याद आते थे।
  • मूर्ति में केवल एक कमी थी—नेताजी की आँखों पर संगमरमर का चश्मा नहीं था। उसकी जगह एक सचमुच का, सामान्य काला चश्मा पहना दिया गया था।
  • हालदार साहब जब भी कस्बे से गुजरते, उन्हें मूर्ति पर हर बार बदला हुआ चश्मा दिखता। कभी चौकोर, कभी गोल, कभी लाल तो कभी काला।

3. पानवाले से बातचीत और कैप्टन का खुलासा

  • कौतूहल बढ़ने पर हालदार साहब ने चौराहे के पानवाले से पूछा। पानवाले ने बताया कि यह काम 'कैप्टन चश्मेवाला' करता है।
  • मास्टर मोतीलाल मूर्ति का चश्मा बनाना भूल गए थे (या पत्थर में पारदर्शी चश्मा बनाने में असफल रहे), इसलिए मूर्ति अधूरी थी।
  • कैप्टन एक गरीब, बूढ़ा और लंगड़ा आदमी था जो फेरी लगाकर चश्मे बेचता था। उसे नेताजी की बिना चश्मे वाली मूर्ति आहत करती थी।
  • वह अपनी दुकान के गिने-चुने फ्रेमों में से एक नेताजी को पहना देता था। जब किसी ग्राहक को वैसे ही फ्रेम की मांग होती, तो वह मूर्ति से उतारकर ग्राहक को दे देता और मूर्ति पर दूसरा फ्रेम लगा देता था।

4. देशभक्ति का उपहास और दुखद अंत

  • पानवाला कैप्टन का मजाक उड़ाते हुए उसे 'पागल' और 'लंगड़ा' कहता था, जो हालदार साहब को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। हालदार साहब कैप्टन की देशभक्ति के प्रति नतमस्तक थे।
  • दो साल तक यह सिलसिला चलता रहा। फिर एक दिन हालदार साहब ने देखा कि मूर्ति पर कोई चश्मा नहीं था।
  • पूछने पर पता चला कि कैप्टन मर गया। हालदार साहब बहुत दुखी हुए और सोचने लगे कि उस देश का क्या होगा जहाँ लोग देशभक्तों का मजाक उड़ाते हैं।

5. सरकंडे का चश्मा और उम्मीद की किरण

  • पंद्रह दिन बाद जब हालदार साहब फिर वहां से गुजरे, तो उन्होंने सोचा कि अब मूर्ति बिना चश्मे के होगी, इसलिए वे उधर देखेंगे भी नहीं।
  • लेकिन आदत से मजबूर उनकी नजर चौराहे पर मूर्ति की ओर उठ गई। उन्होंने जीप रुकवाई और तेज कदमों से मूर्ति के पास गए।
  • उन्होंने देखा कि मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना छोटा सा चश्मा रखा हुआ था, जैसा बच्चे बना लेते हैं।
  • यह देखकर हालदार साहब की आँखें भर आईं। उन्हें संतोष हुआ कि नई पीढ़ी में भी देशभक्ति की भावना जीवित है।
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