Q&A & Flashcards Available

Access questions, answers and flashcards for this chapter

View Q&A
Quick Navigation:
| | |
Infographic
Quick Navigation:
| | |

मन्नू भंडारी : एक कहानी यह भी

यह अध्याय सुप्रसिद्ध लेखिका मन्नू भंडारी द्वारा लिखित एक आत्मकथ्य है। इसमें उन्होंने अपने जीवन के उन पहलुओं, व्यक्तियों और घटनाओं का वर्णन किया है जिन्होंने उनके लेखकीय व्यक्तित्व को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विस्तृत बिंदुवार सारांश

  • 1. पारिवारिक पृष्ठभूमि और बचपन

    लेखिका का जन्म मध्य प्रदेश के भानपुरा गाँव में हुआ था, लेकिन उनकी यादें अजमेर के 'ब्रह्मपुरी' मोहल्ले के दो-मंजिला मकान से शुरू होती हैं। मकान की ऊपरी मंजिल पर पिता का साम्राज्य था, जहाँ वे हमेशा किताबों और पत्रिकाओं में व्यस्त रहते थे। नीचे लेखिका अपनी माँ और भाई-बहनों के साथ रहती थीं।

  • 2. पिता का व्यक्तित्व और संघर्ष

    लेखिका के पिता अजमेर आने से पहले इंदौर में प्रतिष्ठित और खुशहाल थे। वे शिक्षाविद, समाज-सुधारक और कांग्रेस से जुड़े व्यक्ति थे। एक बड़े आर्थिक झटके और अपनों द्वारा धोखा मिलने के बाद वे अजमेर आ गए थे। यहाँ उन्होंने अकेले अपने बलबूते पर 'अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश' (Dictionary) तैयार किया, जिससे उन्हें यश तो मिला पर धन नहीं। गिरती आर्थिक स्थिति और धोखों ने उन्हें बहुत शक्की और क्रोधी बना दिया था।

  • 3. माँ का त्याग और लेखिका का दृष्टिकोण

    पिता के ठीक विपरीत लेखिका की माँ अनपढ़, धैर्यवान और सहनशील थीं। वे पिता के गुस्से और बच्चों की हर जिद को अपना कर्तव्य मानकर स्वीकार करती थीं। लेखिका के लिए उनकी माँ का त्याग और मजबूरी कभी आदर्श नहीं बन सके क्योंकि उसमें उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं था।

  • 4. हीन भावना और रंग-भेद

    लेखिका बचपन में काली और दुबली थीं, जबकि उनकी बड़ी बहन सुशीला गोरी और स्वस्थ थीं। पिता गोरे रंग को पसंद करते थे और हमेशा बड़ी बहन की प्रशंसा करते थे। इससे लेखिका के मन में एक गहरी हीन भावना (Inferiority Complex) बैठ गई थी। बाद में बहुत नाम और सम्मान कमाने के बावजूद वे इस भावना से पूरी तरह उबर नहीं पाईं।

  • 5. 'पड़ोस कल्चर' और बचपन के खेल

    उस समय घर की दीवारें केवल घर तक सीमित नहीं थीं, बल्कि पूरा मोहल्ला ही परिवार जैसा था। लेखिका ने सतोलिया, लँगड़ी-टाँग और पकड़म-पकड़ाई जैसे खेल पड़ोसियों के साथ खेले। उनकी कई कहानियों के पात्र इसी पड़ोस से निकले हैं। महानगरों के फ्लैट कल्चर में आज यह 'पड़ोस कल्चर' समाप्त हो गया है।

  • 6. राजनैतिक जागरूकता की शुरुआत

    जब बड़ी बहन की शादी हो गई और भाई पढ़ने बाहर चले गए, तो पिता का ध्यान मन्नू पर गया। पिता चाहते थे कि वह रसोई (जिसे वे 'भटियारखाना' कहते थे क्योंकि वहाँ प्रतिभा जलकर नष्ट हो जाती है) से दूर रहें। वे चाहते थे कि मन्नू घर में होने वाली राजनैतिक बहसों में बैठे और देश की स्थितियों को समझे। इससे लेखिका के मन में देशभक्ति की भावना जागी।

  • 7. शीला अग्रवाल का प्रभाव और साहित्य

    कक्षा 10 पास करने के बाद कॉलेज में हिंदी प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से लेखिका का परिचय हुआ। उन्होंने लेखिका को चुन-चुनकर अच्छी किताबें (जैसे प्रेमचंद, जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल) पढ़ने के लिए दीं और उन पर बहस की। शीला अग्रवाल ने न केवल साहित्य का दायरा बढ़ाया बल्कि घर की चारदीवारी से निकालकर लेखिका को सक्रिय राजनीति में भी झोंक दिया।

  • 8. स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता (1946-47)

    सन 1946-47 के दौरान देश में आजादी की लहर थी। लेखिका ने भी प्रभात फेरियों, जुलूसों और हड़तालों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। सड़कों पर भाषण देना और नारेबाजी करना उनकी दिनचर्या बन गई थी। यह बात उनके पिता को पसंद नहीं थी क्योंकि वे 'आधुनिकता' के पक्षधर तो थे, लेकिन वे अपनी बेटी को घर की दहलीज के भीतर ही जागरूक देखना चाहते थे, सड़कों पर लड़कों के साथ हाथ उठाते हुए नहीं।

  • 9. पिता के साथ द्वंद्व और गर्व के क्षण

    लेखिका और पिता के बीच वैचारिक टकराव चलता रहता था। दो मुख्य घटनाएं हुईं:

    पहली घटना: कॉलेज की प्रिंसिपल ने पिता को पत्र लिखकर शिकायत की कि मन्नू लड़कियों को भड़काती है। पिता गुस्से में कॉलेज गए, लेकिन लौटकर वे गर्व से भरे थे। प्रिंसिपल ने बताया था कि कॉलेज चलाना मुश्किल है क्योंकि पूरा कॉलेज मन्नू के इशारे पर खाली हो जाता है। पिता को बेटी के इस नेतृत्व और सम्मान पर गर्व हुआ।

    दूसरी घटना: 'आजाद हिंद फौज' के मुकदमे के दौरान लेखिका ने बाजार के मुख्य चौराहे (चौपड़) पर धुआँधार भाषण दिया। पिता के एक दकियानूसी मित्र ने घर आकर पिता को भड़काया कि मन्नू की वजह से उनकी इज्जत मिट्टी में मिल रही है। लेकिन उसी रात शहर के प्रतिष्ठित डॉ. अंबालाल ने आकर मन्नू के भाषण की बहुत तारीफ की और पिता को बधाई दी। पिता का गुस्सा गर्व में बदल गया।

  • 10. निष्कर्ष और आजादी

    लेखिका के पिता विशिष्ट बनने की चाह रखते थे और साथ ही सामाजिक मर्यादाओं का पालन भी चाहते थे, जो आपस में टकराते थे। अंततः, कॉलेज प्रशासन ने अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर लेखिका और उनकी साथियों का प्रवेश निषिद्ध कर दिया, लेकिन बाहर रहकर भी उन्होंने ऐसा हुड़दंग मचाया कि कॉलेज को झुकना पड़ा। यह जीत बड़ी थी, लेकिन 15 अगस्त 1947 को मिली देश की आजादी की 'शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि' के सामने बाकी सब छोटा पड़ गया।

Quick Navigation:
| | |
1 / 1
Quick Navigation:
| | |