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भदंत आनंद कौसल्यायन : संस्कृति

लेखक परिचय: यह पाठ भदंत आनंद कौसल्यायन द्वारा लिखित एक निबंध है। इसमें लेखक ने 'सभ्यता' और 'संस्कृति' जैसे कठिन शब्दों के अर्थ और उनके बीच के सूक्ष्म अंतर को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है।

पाठ का विस्तृत सारांश

  • 1. सभ्यता और संस्कृति में भ्रम
    लेखक का मानना है कि 'सभ्यता' और 'संस्कृति' ऐसे दो शब्द हैं जिनका उपयोग सबसे अधिक होता है, लेकिन जिन्हें समझा सबसे कम जाता है। जब इनके साथ 'भौतिक' या 'आध्यात्मिक' जैसे विशेषण जुड़ जाते हैं, तो इनका अर्थ और भी उलझ जाता है। लेखक इस पाठ में यह गुत्थी सुलझाने की कोशिश करते हैं कि क्या ये एक ही चीज़ हैं या अलग-अलग।
  • 2. संस्कृति की परिभाषा (आविष्कार करने की शक्ति)
    लेखक के अनुसार, 'संस्कृति' वह योग्यता, प्रेरणा या प्रवृत्ति है जो किसी व्यक्ति को कुछ नया खोजने या आविष्कार करने के लिए प्रेरित करती है।

    उदाहरण:
    • जिस आदिमानव ने सबसे पहले आग का आविष्कार किया, वह 'संस्कृत' मानव था क्योंकि उसने अपनी बुद्धि से नई चीज़ खोजी।
    • जिस व्यक्ति ने लोहे के टुकड़े को घिसकर उसमें धागा पिरोकर सुई-धागे का आविष्कार किया, वह भी एक 'संस्कृत' व्यक्ति था।
  • 3. सभ्यता का अर्थ (संस्कृति का परिणाम)
    संस्कृति द्वारा जो आविष्कार होता है, और जिस जीवन-शैली को हम अपनाते हैं, उसे 'सभ्यता' कहते हैं।

    लेखक समझाते हैं कि आज हम आग और सुई-धागे का उपयोग करते हैं, लेकिन हम इनके आविष्कारक नहीं हैं। हमारे पूर्वजों ने जो खोजा (संस्कृति), वह हमें विरासत में मिला और हमारे रहन-सहन का हिस्सा बन गया, यही हमारी 'सभ्यता' है। इसलिए, हम 'सभ्य' तो हो सकते हैं, लेकिन उन आविष्कारकों की तरह 'संस्कृत' नहीं कहला सकते।
  • 4. न्यूटन का उदाहरण
    लेखक गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज करने वाले न्यूटन को एक 'संस्कृत' मानव मानते हैं। आज का विज्ञान का छात्र न्यूटन से अधिक बातें जानता हो सकता है (क्योंकि उसे ज्ञान विरासत में मिला है), वह न्यूटन से अधिक 'सभ्य' हो सकता है, लेकिन वह न्यूटन जैसा 'संस्कृत' नहीं हो सकता क्योंकि मौलिक खोज न्यूटन की थी।
  • 5. संस्कृति के मूल कारण: पेट, तन और मन
    संस्कृति के निर्माण में केवल शारीरिक आवश्यकताओं का हाथ नहीं होता:
    • शारीरिक आवश्यकता: आग का आविष्कार पेट की भूख मिटाने के लिए और सुई-धागे का आविष्कार तन को सर्दी-गर्मी से बचाने के लिए हुआ होगा।
    • जिज्ञासा (कौतूहल): जिस व्यक्ति का पेट भरा हो और तन ढका हो, फिर भी जो रात को तारों को देखकर सो नहीं पाता और यह जानने को बेचैन रहता है कि यह दुनिया क्या है—वह ज्ञान की इच्छा (मनीषा) भी संस्कृति की जननी है।
  • 6. परोपकार और त्याग की भावना
    लेखक बताते हैं कि संस्कृति केवल अपनी भलाई तक सीमित नहीं है। दूसरों के कल्याण के लिए किया गया त्याग भी संस्कृति है।

    प्रमुख उदाहरण:
    • लेनिन: रूस के भाग्यविधाता लेनिन अपनी डेस्क में रखी ब्रेड खुद न खाकर दूसरों को खिला देते थे।
    • कार्ल मार्क्स: मजदूरों को सुखी देखने के लिए उन्होंने जीवन भर दुःख उठाए।
    • सिद्धार्थ (गौतम बुद्ध): मानवता को तृष्णा और कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए उन्होंने अपना राजमहल और घर-बार त्याग दिया।
  • 7. संस्कृति बनाम असंस्कृति
    लेखक एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं: यदि मानव अपनी बुद्धि का प्रयोग आत्म-विनाश (जैसे बम या हथियार बनाने) के लिए करता है, तो उसे क्या कहा जाए?
    लेखक इसे 'असंस्कृति' कहते हैं। यदि संस्कृति का नाता मानव कल्याण से टूट जाए, तो वह असंस्कृति बन जाती है। ऐसी असंस्कृति का परिणाम 'असभ्यता' और विनाश ही होता है।
  • 8. निष्कर्ष: संस्कृति और मानव कल्याण
    अंत में, लेखक कहते हैं कि संस्कृति कोई कूड़े-कचरे का ढेर नहीं है जिसे बदला न जा सके। यह एक निरंतर बहने वाली धारा है।
    • मानव संस्कृति अविभाज्य है (इसे हिंदू, मुस्लिम या अन्य धर्मों में बांटा नहीं जा सकता)।
    • संस्कृति का वही अंश श्रेष्ठ और स्थायी है जो मानव कल्याण (भलाई) के लिए है।
    • जो कल्याणकारी नहीं है, वह न तो सभ्यता है और न ही संस्कृति।
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