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रामवृक्ष बेनीपुरी : बालगोबिन भगत

व्यक्तित्व और वेशभूषा

  • बालगोबिन भगत मंझोले कद के, गोरे-चिट्टे आदमी थे जिनकी उम्र साठ वर्ष से ऊपर थी।
  • उनके बाल पक चुके थे और चेहरा हमेशा सफेद बालों से जगमगाता रहता था। वे लंबी दाढ़ी नहीं रखते थे।
  • कपड़े बहुत कम पहनते थे। कमर में एक लंगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी पहनते थे। सर्दियों में ऊपर से एक काली कमली (कंबल) ओढ़े रहते थे।
  • माथे पर हमेशा रामानंदी चंदन का टीका लगाते थे और गले में तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला पहनते थे।

साधु जैसा आचरण

  • खेती-बाड़ी और परिवार वाले गृहस्थ होते हुए भी उनका आचरण साधुओं जैसा था।
  • वे कबीर को 'साहब' मानते थे, उन्हीं के गीतों को गाते और उन्हीं के आदेशों पर चलते थे।
  • वे कभी झूठ नहीं बोलते थे और सबसे खराब व्यवहार रखते थे। किसी की चीज को बिना पूछे नहीं छूते थे और न ही व्यवहार में लाते थे।
  • खेत में जो भी पैदावार होती, उसे सिर पर लादकर कबीरपंथी मठ में ले जाते और वहां से जो कुछ 'प्रसाद' रूप में मिलता, उसी से गुजारा करते थे।

संगीत साधना और दिनचर्या

  • आषाढ़ (वर्षा ऋतु): जब पूरा गाँव खेतों में धान की रोपाई कर रहा होता, तब बालगोबिन भगत कीचड़ में लथपथ होकर गाते हुए रोपाई करते। उनका संगीत बच्चों, औरतों और हलवाहों सभी को झूमने पर मजबूर कर देता था।
  • भादो (अंधेरी रातें): भादो की आधी रात में मूसलाधार बारिश के बाद भी उनकी खंजड़ी बजती और वे गाते— "गोदी में पियवा, चमक उठे सखिया, चिहुँक उठे ना!"
  • कार्तिक (सर्दी की शुरुआत): कार्तिक आते ही उनकी प्रभातियाँ (सुबह के गीत) शुरू हो जाती थीं। वे सुबह जल्दी उठकर नदी स्नान करते और गाँव के बाहर पोखर के ऊंचे भिंडे पर अपनी खंजड़ी लेकर गाने बैठ जाते।
  • गर्मियाँ: गर्मियों की शाम को वे अपने घर के आंगन में आसन जमाते। प्रेमी मंडली के साथ खंजड़ियों और करतालों की भरमार हो जाती। गाते-गाते वे नाचने लगते और तल्लीन हो जाते।

बेटे की मृत्यु और सामाजिक रूढ़ियों का खंडन

  • उनका इकलौता बेटा सुस्त और बोदा (कम बुद्धि वाला) था, जिसे वे बहुत मानते थे।
  • बेटे की मृत्यु पर उन्होंने रोने के बजाय उत्सव मनाया। शव को सफेद कपड़े से ढका, फूल और तुलसीदल बिखेरे और सिरहाने चिराग जलाया।
  • वे जमीन पर बैठकर कबीर के पद गाते रहे और अपनी पतोहू (बहू) को भी रोने के बजाय उत्सव मनाने को कहा, क्योंकि "आत्मा परमात्मा के पास चली गई, विरहिनी अपने प्रेमी से जा मिली।"
  • उन्होंने सामाजिक परंपराओं को तोड़ते हुए बेटे की चिता को अपनी पतोहू से मुखाग्नि दिलवाई।
  • श्राद्ध की अवधि पूरी होने पर पतोहू के भाई को बुलाकर उसे साथ भेज दिया और आदेश दिया कि इसकी दूसरी शादी कर देना।
  • पतोहू उनकी सेवा करना चाहती थी, लेकिन भगत का निर्णय अटल था। उन्होंने कहा, "तू जा, नहीं तो मैं ही इस घर को छोड़कर चल दूंगा।"

अंतिम समय

  • बालगोबिन भगत की मृत्यु उन्हीं के अनुरूप शांत भाव से हुई।
  • वे हर वर्ष गंगा स्नान को जाते थे। वे घर से खाकर चलते और वापस लौटकर ही खाते थे। रास्ते भर गाते-बजाते और प्यास लगने पर पानी पी लेते।
  • इस बार लौटे तो तबीयत सुस्त थी और थोड़ा बुखार आने लगा, लेकिन उन्होंने अपना नेम-व्रत (स्नान-ध्यान और खेती) नहीं छोड़ा।
  • शरीर कमजोर होता गया। लोगों ने आराम करने को कहा, पर वे हंसकर टाल देते।
  • एक शाम उन्होंने गीत गाए, पर स्वर टूटा हुआ सा लगा। अगली सुबह लोगों ने गीत नहीं सुना। जाकर देखा तो बालगोबिन भगत नहीं रहे, सिर्फ उनका पंजर (शव) पड़ा था।
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