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राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
1. कवि परिचय: तुलसीदास
- जीवन परिचय: गोस्वामी तुलसीदास का जन्म सन् 1532 में उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के राजापुर गाँव में हुआ था। उनका बचपन संघर्षपूर्ण रहा और वे अपने गुरु की कृपा से राम-भक्ति के मार्ग पर चले।
- प्रमुख रचनाएँ: उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना 'रामचरितमानस' है। इसके अलावा 'कवितावली', 'गीतावली', 'दोहावली', 'कृष्णगीतावली' और 'विनयपत्रिका' भी प्रमुख हैं।
- साहित्यिक विशेषताएँ: वे अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं के सिद्धहस्त कवि थे। प्रस्तुत पाठ 'रामचरितमानस' के बालकाण्ड से लिया गया है।
2. प्रसंग (Context)
- यह प्रसंग सीता स्वयंवर का है। श्री राम द्वारा शिवजी का धनुष तोड़े जाने के बाद परशुराम जी क्रोधित होकर सभा में आते हैं।
- टूटे हुए धनुष को देखकर वे आपे से बाहर हो जाते हैं। तब राम की विनय, विश्वामित्र के समझाने और लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण तर्कों का दौर चलता है।
3. संवाद का विस्तृत सारांश
श्री राम की विनम्रता और परशुराम का क्रोध
- परशुराम के क्रोधित होने पर श्री राम अत्यंत विनम्रता से कहते हैं कि शिव धनुष को तोड़ने वाला कोई उनका ही दास होगा।
- इस पर परशुराम भड़क उठते हैं और कहते हैं कि "सेवक वह होता है जो सेवा करे, शत्रुता का काम करके तो लड़ाई ही मोल ली जाती है।"
- वे चेतावनी देते हैं कि जिसने भी यह धनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। वह व्यक्ति तुरंत समाज से अलग हो जाए, अन्यथा यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे।
लक्ष्मण के व्यंग्य और तर्क
- परशुराम की बातें सुनकर लक्ष्मण मुस्कुराते हैं और उनका अपमान करते हुए कहते हैं कि बचपन में हमने बहुत सी धनुहियाँ (छोटे धनुष) तोड़ी थीं, तब तो आपने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया।
- लक्ष्मण पूछते हैं कि इस विशेष धनुष पर इतनी ममता क्यों है? यह सुनकर भृगुवंश की ध्वज स्वरूप परशुराम और अधिक क्रोधित हो जाते हैं।
- परशुराम कहते हैं कि यह कोई साधारण धनुष नहीं, बल्कि 'त्रिपुरारी' (शिव) का धनुष है जिसे पूरा संसार जानता है।
परशुराम का आत्म-प्रशंसा और धमकी
- परशुराम अपने फरसे (कुल्हाड़े) की ओर देखकर अपनी वीरता का बखान करते हैं। वे कहते हैं कि वे बाल ब्रह्मचारी हैं और क्षत्रिय कुल के घोर शत्रु हैं।
- वे बताते हैं कि उन्होंने अपनी भुजाओं के बल पर कई बार धरती को राजाओं से हीन कर दिया और उसे ब्राह्मणों को दान दे दिया।
- वे लक्ष्मण को डराते हुए कहते हैं कि मेरा फरसा इतना भयानक है कि यह गर्भ में पल रहे बच्चों का भी नाश कर सकता है, इसलिए तुम अपने माता-पिता को शोक में मत डालो।
लक्ष्मण का पलटवार
- लक्ष्मण हँसते हुए कोमल वाणी में कहते हैं कि मुनिवर आप तो खुद को बहुत बड़ा योद्धा मान रहे हैं और मुझे बार-बार कुल्हाड़ा दिखा रहे हैं, जैसे फूँक मारकर पहाड़ उड़ाना चाहते हों।
- लक्ष्मण निडरता से कहते हैं, "यहाँ कोई कुम्हड़े की बतिया (बहुत कमजोर फल/फूल) नहीं है जो तर्जनी उँगली दिखाने से मर जाएगा।"
- वे कहते हैं कि मैंने आपके हाथ में धनुष-बाण और फरसा देखकर ही कुछ अभिमान सहित कहा था।
- लक्ष्मण अपने कुल की मर्यादा बताते हैं: "हमारे कुल (रघुकुल) में देवता, ब्राह्मण, भगवान के भक्त और गाय पर वीरता नहीं दिखाई जाती। इन्हें मारने से पाप लगता है और हारने पर अपयश होता है।"
- लक्ष्मण व्यंग्य करते हैं कि परशुराम जी का तो एक-एक वचन ही करोड़ों वज्रों के समान कठोर है, उन्होंने तो व्यर्थ ही धनुष-बाण और फरसा धारण किया हुआ है।
4. निष्कर्ष
- इस पूरे प्रसंग में लक्ष्मण की वाकपटुता और व्यंग्य शैली दर्शनीय है। जहाँ परशुराम 'वीर रस' और क्रोध में डूबे हैं, वहीं लक्ष्मण मुस्कुराहट और तर्कों से उनका सामना करते हैं।
- अंत में, विश्वामित्र के समझाने और राम की विनय से परशुराम का क्रोध शांत होता है।
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