एक कहानी यह भी
प्रश्न-अभ्यास1. लेखिका के व्यक्तित्व पर किन-किन व्यक्तियों का किस रूप में प्रभाव पड़ा?
लेखिका मन्नू भंडारी के व्यक्तित्व पर मुख्य रूप से दो लोगों का गहरा प्रभाव पड़ा:
1. पिता जी का प्रभाव: लेखिका के जीवन पर उनके पिता का प्रभाव सकारात्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में पड़ा। वे लेखिका की तुलना उनकी बड़ी बहन सुशीला से करते थे, जिससे लेखिका के मन में हीन भावना (inferiority complex) पैदा हुई। हालाँकि, पिता जी ने ही उन्हें देश-प्रेम, राजनीति और बहस करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने लेखिका को रसोई तक सीमित न रखकर बाहर की दुनिया से जोड़ा।
2. प्राध्यापिका शीला अग्रवाल का प्रभाव: हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल ने लेखिका के साहित्यिक व्यक्तित्व को उभारा। उन्होंने लेखिका को चुन-चुनकर अच्छी किताबें पढ़ने के लिए दीं और उन पर बहस की। इससे लेखिका का साहित्य का दायरा बढ़ा। साथ ही, शीला अग्रवाल ने ही लेखिका के मन में आज़ादी के प्रति जोश भरा और उन्हें सक्रिय राजनीति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
2. इस आत्मकथ्य में लेखिका के पिता ने रसोई को 'भटियारखाना' कहकर क्यों संबोधित किया है?
लेखिका के पिता का मानना था कि रसोई में काम करने से लड़कियों की प्रतिभा और क्षमता नष्ट हो जाती है। वे रसोई को 'भटियारखाना' इसलिए कहते थे क्योंकि वहां हमेशा भट्ठी (चूल्हा) जलती रहती है और वहां रहने वाला व्यक्ति अपनी योग्यता को उसी भट्ठी में झोंक देता है। उनका विचार था कि रसोई तक सीमित रहने से व्यक्ति देश और समाज के लिए कुछ बड़ा नहीं कर पाता।
3. वह कौन-सी घटना थी जिसके बारे में सुनने पर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हो पाया और न अपने कानों पर?
एक बार कॉलेज के प्रिंसिपल ने लेखिका के पिता को पत्र लिखकर शिकायत की कि मन्नू के कारण कॉलेज का अनुशासन बिगड़ रहा है, इसलिए उसे घर बिठा लें। पिता जी गुस्से में कॉलेज गए थे, लेकिन जब लौटे तो वे बेहद खुश और गर्वित थे। उन्होंने बताया कि कॉलेज में मन्नू का इतना रौब है कि उसके एक इशारे पर लड़कियां क्लास छोड़कर बाहर आ जाती हैं और नारे लगाने लगती हैं। प्रिंसिपल ने तो यहाँ तक कहा कि कॉलेज चलाना मुश्किल हो गया है। पिता जी ने इसे 'देश की पुकार' बताकर लेखिका की प्रशंसा की। पिता जी के मुँह से अपनी ऐसी तारीफ सुनकर लेखिका को न अपनी आँखों पर विश्वास हुआ और न कानों पर।
4. लेखिका की अपने पिता से वैचारिक टकराहट को अपने शब्दों में लिखिए।
लेखिका और उनके पिता के विचारों में कई मुद्दों पर टकराहट थी:
* रंग-रूप को लेकर: पिता जी को गोरा रंग पसंद था, जबकि लेखिका सांवली थीं। बचपन में वे सुशीला (गोरी बहन) से लेखिका की तुलना करते थे, जो लेखिका को पसंद नहीं था।
* स्वतंत्रता की सीमा: पिता जी चाहते थे कि लेखिका घर में होने वाली राजनीतिक बहसों में बैठे और जाने, लेकिन वे यह नहीं चाहते थे कि वह घर की चारदीवारी से बाहर जाकर लड़कों के साथ हड़ताल या जुलूसों में भाग ले। दूसरी ओर, लेखिका सक्रिय रूप से स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेना चाहती थीं।
* विशिष्ट बनने की चाह: पिता जी चाहते थे कि मन्नू कुछ विशिष्ट बने, लेकिन उनका तरीका लेखिका की स्वतंत्रता की राह में बाधा बनता था। पिता जी 'समाज में छवि' को लेकर बहुत सजग थे, जबकि लेखिका अपनी मर्जी से जीने में विश्वास रखती थीं।
5. इस आत्मकथ्य के आधार पर स्वाधीनता आंदोलन के परिदृश्य का चित्रण करते हुए उसमें मन्नू जी की भूमिका को रेखांकित कीजिए।
सन् 1946-47 के समय पूरे देश में स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था। हर शहर में प्रभात-फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस और भाषण हो रहे थे। युवा वर्ग इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहा था।
इस परिदृश्य में मन्नू जी की भूमिका बहुत सक्रिय और उत्साहजनक थी:
* वे अपने कॉलेज की छात्राओं का नेतृत्व करती थीं।
* वे सड़कों पर जुलूस निकालती थीं और नारेबाजी करती थीं।
* उनकी भाषण क्षमता अद्भुत थी, जिससे वे भीड़ को प्रभावित करती थीं।
* उन्होंने पिता के विरोध के बावजूद आज़ादी की लड़ाई में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की और शहर के चौपड़ (मुख्य बाज़ार) पर धुआँधार भाषण देकर लोगों को प्रेरित किया।
रचना और अभिव्यक्ति
6. लेखिका ने बचपन में अपने भाइयों के साथ गिल्ली डंडा तथा पतंग उड़ाने जैसे खेल भी खेले किंतु लड़की होने के कारण उनका दायरा घर की चारदीवारी तक सीमित था। क्या आज भी लड़कियों के लिए स्थितियाँ ऐसी ही हैं या बदल गई हैं, अपने परिवेश के आधार पर लिखिए।
आज लड़कियों के लिए स्थितियाँ काफी बदल गई हैं। अब लड़कियों का दायरा केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं है:
* शिक्षा और खेल: लड़कियाँ अब लड़कों के साथ स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ रही हैं और हर तरह के खेलों (क्रिकेट, बैडमिंटन, कुश्ती आदि) में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा रही हैं।
* नौकरी और करियर: लड़कियाँ अब पायलट, डॉक्टर, इंजीनियर और सेना अधिकारी बन रही हैं। वे घर से दूर जाकर होस्टल में रहती हैं और काम करती हैं।
* स्वतंत्रता: माता-पिता अब अपनी बेटियों को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उन पर पुरानी बंदिशें कम हो गई हैं।
हालाँकि, कुछ ग्रामीण या रूढ़िवादी परिवारों में अभी भी पूरी तरह बदलाव नहीं आया है, लेकिन शहरी परिवेश में बहुत बड़ा सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है।
7. मनुष्य के जीवन में आस-पड़ोस का बहुत महत्त्व होता है। परंतु महानगरों में रहने वाले लोग प्रायः 'पड़ोस कल्चर' से वंचित रह जाते हैं। इस बारे में अपने विचार लिखिए।
यह बात बिल्कुल सही है। पुराने समय में आस-पड़ोस एक परिवार की तरह होता था, जहाँ सुख-दुख साझा किए जाते थे और बच्चों को एक बड़ा सामाजिक दायरा मिलता था।
महानगरों (Metro Cities) में स्थिति अलग है:
* अकेलापन: लोग फ्लैट्स में रहते हैं और अक्सर अपने बगल वाले पड़ोसी को भी नहीं जानते।
* सुरक्षा की भावना की कमी: एक-दूसरे को न जानने के कारण असुरक्षा की भावना बनी रहती है।
* वक्त की कमी: भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों के पास मेल-जोल बढ़ाने का समय नहीं है।
'पड़ोस कल्चर' के खत्म होने से हम संकुचित और आत्मकेंद्रित (self-centered) होते जा रहे हैं, जो सामाजिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।
8. लेखिका द्वारा पढ़े गए उपन्यासों की सूची बनाइए और उन उपन्यासों को अपने पुस्तकालय में खोजिए।
लेखिका मन्नू भंडारी ने अपने आत्मकथ्य में निम्नलिखित उपन्यासों और साहित्यों का जिक्र किया है:
1. सुनीता - जैनेंद्र कुमार
2. त्यागपत्र - जैनेंद्र कुमार
3. शेखर : एक जीवनी - अज्ञेय
4. नदी के द्वीप - अज्ञेय
5. चित्रलेखा - भगवतीचरण वर्मा
6. शरत्चंद्र और प्रेमचंद की रचनाएँ।
(छात्र इन पुस्तकों को अपने विद्यालय के पुस्तकालय में खोज सकते हैं।)
9. आप भी अपने दैनिक अनुभवों को डायरी में लिखिए।
(यह प्रश्न विद्यार्थी के स्वयं करने के लिए है। विद्यार्थी अपनी रोजमर्रा की खास घटनाओं को डायरी में नोट करें।)
भाषा-अध्ययन
10. इस आत्मकथ्य में मुहावरों का प्रयोग करके लेखिका ने रचना को रोचक बनाया है। रेखांकित मुहावरों को ध्यान में रखकर कुछ और वाक्य बनाएँ-
(क) इस बीच पिता जी के एक निहायत दकियानूसी मित्र ने घर आकर अच्छी तरह पिता जी की लू उतारी।
मुहावरा: लू उतारना (खूब खरी-खोटी सुनाना / खबर लेना)
वाक्य: परीक्षा में फेल होने पर पिताजी ने रोहन की अच्छी तरह लू उतारी।
(ख) वे तो आग लगाकर चले गए और पिता जी सारे दिन भभकते रहे।
मुहावरा 1: आग लगाना (झगड़ा करवाना / भड़काना)
वाक्य: कुछ पड़ोसियों की आदत ही होती है दूसरों के घर में आग लगाना।
मुहावरा 2: भभकते रहना (गुस्से में जलना)
वाक्य: मेरी गलती पर बड़े भैया सुबह से भभक रहे हैं।
(ग) बस अब यही रह गया है कि लोग घर आकर थू-थू करके चले जाएँ।
मुहावरा: थू-थू करना (अपमानित करना / निंदा करना)
वाक्य: समाज में गलत काम करने वालों पर सब थू-थू करते हैं।
(घ) पत्र पढ़ते ही पिता जी आग-बबूला।
मुहावरा: आग-बबूला होना (अत्यधिक क्रोधित होना)
वाक्य: कीमती घड़ी टूटी देखकर माँ गुस्से से आग-बबूला हो गईं।