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कबीर के दोहे

  • १. कबीर दास जी का संक्षिप्त परिचय

    कबीर काशी के एक प्रसिद्ध संत थे। वे जुलाहे का काम (कपड़े बुनने का कार्य) करते थे और अपना कार्य करते हुए मन ही मन कविताएँ रचते थे। उनकी रचनाएँ मुख्य रूप से 'कबीर ग्रंथावली' में संकलित हैं और आज भी भजनों के रूप में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
  • २. गुरु की महानता का वर्णन

    कबीर जी के अनुसार, यदि गुरु और भगवान (गोविंद) दोनों एक साथ सामने खड़े हों, तो मनुष्य को सबसे पहले अपने गुरु के चरणों में शीश झुकाना चाहिए। इसका कारण यह है कि गुरु ही वह मार्गदर्शक है जिसने अपने ज्ञान से भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाया है। गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊँचा माना गया है।
  • ३. सत्य की महिमा

    सत्य के मार्ग पर चलना सबसे बड़ी तपस्या है और झूठ बोलने के समान दुनिया में कोई दूसरा पाप नहीं है। जिस मनुष्य के हृदय में सत्य का वास होता है, उसी निर्मल हृदय में स्वयं ईश्वर (गुरु) निवास करते हैं। अतः सत्य का पालन जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण मूल्य है।
  • ४. निरर्थक बड़प्पन का त्याग

    कबीर कहते हैं कि केवल धन-संपत्ति या आकार में बड़ा होने से कोई महान नहीं होता। खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा और बड़ा होता है, लेकिन राहगीरों को उससे कोई छाया नहीं मिलती और उसके फल भी बहुत ऊँचाई पर लगते हैं जो आसानी से प्राप्त नहीं होते। सच्चा बड़प्पन वह है जो दूसरों के काम आए और जिसमें उदारता हो।
  • ५. जीवन में संतुलन की आवश्यकता

    किसी भी कार्य या परिस्थिति में 'अति' (अधिकता) बुरी होती है। न तो हद से ज्यादा बोलना अच्छा है और न ही बहुत अधिक चुप रहना। ठीक वैसे ही जैसे न अत्यधिक बारिश होना हितकर है और न ही भयंकर तेज़ धूप का होना। मनुष्य को जीवन में हमेशा संतुलन बनाकर चलना चाहिए।
  • ६. मधुर और विनम्र वाणी का महत्त्व

    मनुष्य को अपने मन का अहंकार छोड़कर हमेशा मीठे और मधुर वचन बोलने चाहिए। ऐसी वाणी बोलने से न केवल सुनने वाले व्यक्ति को सुख और प्रसन्नता मिलती है, बल्कि बोलने वाले के स्वयं के मन को भी शीतलता और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  • ७. निंदक (आलोचक) को समीप रखना

    हमें अपनी बुराई या आलोचना करने वालों से दूर भागने के बजाय उन्हें अपने आस-पास (आँगन में कुटी छवाकर) रखना चाहिए। आलोचक हमारे सच्चे हितैषी होते हैं क्योंकि वे हमारी गलतियाँ बताकर, बिना साबुन और पानी के ही हमारे स्वभाव को शुद्ध और निर्मल बनाने में मदद करते हैं।
  • ८. विवेकशील और सज्जन व्यक्ति की पहचान

    एक सज्जन व्यक्ति (साधु) का स्वभाव सूप (अनाज साफ़ करने वाले छाज) के समान होना चाहिए। जिस प्रकार सूप अच्छे और काम के अनाज को अपने पास रख लेता है और व्यर्थ के कूड़े (थोथी) को उड़ाकर बाहर कर देता है, उसी प्रकार समझदार व्यक्ति को समाज की अच्छी और सार्थक बातों को ग्रहण करना चाहिए और बुरी बातों को त्याग देना चाहिए।
  • ९. संगति का गहरा प्रभाव

    कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य का मन एक चंचल पक्षी के समान है जो जहाँ चाहे वहाँ उड़कर पहुँच जाता है। व्यक्ति जैसी संगति (अच्छे या बुरे लोगों के साथ) में अपना समय व्यतीत करता है, उसे अपने जीवन में वैसा ही फल प्राप्त होता है। इसलिए हमेशा अच्छी संगति का चुनाव करना चाहिए।
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