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हरिद्वार

यह पाठ 'कविवचन सुधा' पत्रिका (वर्ष 1871) में प्रकाशित भारतेन्दु हरिश्चन्द्र द्वारा लिखा गया एक रोचक यात्रा-वृत्तांत है। पत्र के रूप में लिखे गए इस वृत्तांत में उन्होंने अपनी हरिद्वार यात्रा, वहां के प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक शांति का अत्यंत सजीव वर्णन किया है। इस अध्याय का विस्तृत सारांश नीचे दिया गया है:

  • प्राकृतिक और भौगोलिक सौंदर्य हरिद्वार तीन ओर से हरे-भरे पर्वतों से घिरा हुआ है। यहाँ के विशाल वृक्ष तपस्या करते हुए साधुओं के समान प्रतीत होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों को फल, फूल, छाया और लकड़ी प्रदान करते हैं। पक्षी बिना किसी शिकारी के डर के स्वतंत्रतापूर्वक चहचहाते हैं और यहाँ की हरियाली मखमली गलीचे जैसी प्रतीत होती है।
  • पवित्र गंगा और उसकी धाराएँ गंगा नदी का जल अत्यंत शीतल, निर्मल और मीठा है, मानों चीनी के शरबत को बर्फ में जमा दिया गया हो। यहाँ गंगा दो धाराओं में बँट जाती है— एक नील धारा और दूसरी मुख्य गंगा। इनके बीच एक सुंदर पर्वत है। नील धारा के तट पर एक छोटी पहाड़ी पर माँ चंडिका देवी का मंदिर स्थित है।
  • हर की पौड़ी और स्थानीय माहौल मुख्य स्नान स्थल 'हर की पौड़ी' है। गंगा किनारे यात्रियों के लिए राजाओं द्वारा बनवाई गई धर्मशालाएँ और दुकानें हैं। यह ऐसा निर्मल तीर्थ है जहाँ पहुँचते ही मनुष्य के भीतर से सांसारिक इच्छाएँ और क्रोध समाप्त हो जाते हैं।
  • पुरोहितों (पंडों) का स्वभाव यहाँ ज्वालापुर और कनखल से आने वाले पंडे बहुत ही संतोषी स्वभाव के हैं। वे अत्यंत लालची नहीं होते; बल्कि एक छोटे से दान (एक पैसे) को भी लाख रुपये के बराबर मानकर प्रसन्न हो जाते हैं।
  • हरिद्वार के पाँच प्रमुख तीर्थ इस पुण्य क्षेत्र में मुख्य रूप से पाँच तीर्थ माने गए हैं— हरिद्वार (हर की पौड़ी), कुशावर्त, नीलधारा, बिल्व पर्वत (जहाँ बिल्वेश्वर महादेव का मंदिर है) और कनखल। कनखल वही पौराणिक स्थान है जहाँ राजा दक्ष ने यज्ञ किया था और माता सती ने देह का त्याग किया था।
  • लेखक का व्यक्तिगत अनुभव लेखक अपने प्रवास के दौरान दीवान कृपा राम के बंगले में ठहरे थे। उन्होंने चंद्र ग्रहण के अवसर पर गंगा में स्नान किया और श्रीमद्भागवत का पाठ सुना। गंगा किनारे ठंडी हवा के बीच पत्थरों पर बैठकर सादा भोजन करने में उन्हें जो आनंद मिला, वह सोने की थाली में भोजन करने से भी कहीं अधिक था।
  • वैराग्य और भूमि की अलौकिकता हरिद्वार के पवित्र वातावरण में मन स्वतः ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से भर जाता है। यहाँ की भूमि इतनी पुण्यमयी है कि यहाँ उगने वाली साधारण कुशा (घास) में भी दालचीनी और जावित्री जैसी उत्तम सुगंध आती है। यह स्थान सच्चे साधुओं और निर्मल हृदय वालों के लिए एक आदर्श जगह है।
"यह भूमि साक्षात वैराग्यमय साधुओं और विरक्तों के सेवन योग्य है।"
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