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दो गौरैया


कहानी का विस्तृत सारांश

  • घर या सराय: लेखक बताते हैं कि उनके घर में केवल तीन सदस्य (लेखक, माँ और पिताजी) रहते हैं। परंतु पिताजी अक्सर चिढ़कर कहते हैं कि यह घर एक 'सराय' (धर्मशाला) बन गया है क्योंकि यहाँ कबूतर, चमगादड़, बिल्लियाँ, बीसियों चूहे और अन्य पक्षी अपना डेरा डाले रहते हैं।
  • गौरैयों का प्रवेश: एक दिन दो गौरैयाँ घर के अंदर आ गईं और उन्होंने बिना किसी से पूछे बैठक (ड्राइंग रूम) की छत पर लगे पंखे के गोले में अपना घोंसला बना लिया। वे दोनों मज़े से वहीं बैठकर चहचहाने लगीं।
  • पिताजी का गुस्सा: गौरैयों को घर में अपना कब्ज़ा जमाते देख पिताजी को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने ठान लिया कि वे उन्हें निकाल कर ही दम लेंगे। माँ इस स्थिति को देखकर मज़े लेती रहीं और पिताजी पर व्यंग्य करती रहीं, जिससे पिताजी और भी चिढ़ गए।
  • भगाने के असफल प्रयास: पिताजी ने उन्हें भगाने के लिए अजीबोगरीब तरीके अपनाए। वे कभी लाठी घुमाते, कभी तालियाँ बजाते, तो कभी छलाँगें लगाकर 'श...शू' करते। गौरैयाँ कभी बाहर भाग जातीं, लेकिन फिर दरवाजे के नीचे की खाली जगह या रोशनदान के टूटे शीशे से दोबारा अंदर आ जातीं। माँ पिताजी की इन कोशिशों पर खूब हँसती थीं।
  • प्रतिदिन का संघर्ष: यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा। पिताजी दिन में उन्हें भगाते, लेकिन रात को वे दोनों चुपके से अंदर आ जातीं और सुबह होते ही फिर से चहचहाना शुरू कर देतीं।
  • घोंसला तोड़ने का निर्णय: जब पिताजी का धैर्य टूट गया, तो उन्होंने हार न मानने की बात कहते हुए एक स्टूल मँगवाया। वे स्टूल पर चढ़ गए और लाठी से पंखे पर बने उस घोंसले को पूरी तरह से नोचकर गिराने लगे। माँ ने उन्हें याद भी दिलाया कि शायद चिड़ियों ने अंडे दे दिए हैं, लेकिन पिताजी नहीं रुके।
  • कहानी में नाटकीय मोड़: जैसे ही पिताजी घोंसले के तिनके लाठी से खींच रहे थे, अचानक घोंसले के अंदर से ज़ोर-ज़ोर से "चीं-चीं" की आवाज़ें आने लगीं। जब पिताजी और लेखक ने ऊपर देखा, तो पाया कि दो नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ (बच्चे) सिर निकाले हुए अपने माता-पिता को पुकार रही थीं।
  • हृदय परिवर्तन (क्लाइमेक्स): उन छोटे और बेबस बच्चों को देखकर पिताजी एकदम ठिठक गए। उनके भीतर की सारी कठोरता पिघल गई। वे चुपचाप स्टूल से नीचे उतरे, लाठी को एक किनारे रख दिया और शांति से कुर्सी पर बैठ गए।
  • सुखद अंत: माँ ने तुरंत उठकर कमरे के सभी दरवाज़े खोल दिए। दरवाज़े खुलते ही बाहर बैठी दोनों बड़ी गौरैयाँ (माता-पिता) फौरन अंदर आईं और अपने बच्चों की चोंच में दाना (चुग्गा) डालने लगीं। पूरा कमरा फिर से पक्षियों के शोर से भर गया, लेकिन इस बार पिताजी उन्हें भगाने के बजाय चुपचाप देख-देखकर मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने उन नन्हे जीवों को अपने घर और जीवन का हिस्सा मान लिया था।
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