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मेरे संग की औरतें

लेखिका की नानी

  • लेखिका (मृदुला गर्ग) ने अपनी नानी को कभी नहीं देखा था क्योंकि उनकी मृत्यु लेखिका की माँ की शादी से पहले ही हो गई थी।
  • नानी एक पारंपरिक, अनपढ़ और पर्दानशीं महिला थीं, जबकि उनके पति (लेखिका के नाना) विलायती रीति-रिवाजों के शौकीन थे और बैरिस्ट्री पढ़कर लौटे थे।
  • नानी ने अपने पति की जीवनशैली का कभी विरोध नहीं किया, लेकिन खुद अपने तरीके से जीती रहीं।
  • मृत्यु के निकट आने पर नानी ने अपनी चुप्पी तोड़ी और अपने पति के स्वतंत्रता सेनानी मित्र प्यारेलाल शर्मा को बुलाकर कहा कि उनकी बेटी (लेखिका की माँ) की शादी किसी 'साहब' से नहीं, बल्कि आजादी के सिपाही (स्वतंत्रता सेनानी) से होनी चाहिए।
  • इससे पता चलता है कि नानी भले ही घर की चारदीवारी में रहती थीं, लेकिन उनके मन में देश की आजादी के लिए गहरा सम्मान और जुनून था।

लेखिका की माँ

  • नानी की इच्छा के अनुसार, माँ की शादी एक पढ़े-लिखे होनहार युवक (लेखिका के पिता) से हुई, जो स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण आई.सी.एस. की परीक्षा में नहीं बैठ सके थे।
  • माँ गांधीजी के सिद्धांतों का पालन करती थीं और सादा जीवन जीती थीं। वे इतनी नाजुक थीं कि खादी की भारी साड़ी पहनना उनके लिए मुश्किल होता था।
  • माँ भारतीय माँओं जैसी पारंपरिक नहीं थीं। उन्होंने कभी बच्चों के लिए खाना नहीं पकाया और न ही उन्हें लाड-प्यार किया। उनका समय किताबें पढ़ने, संगीत सुनने और साहित्य चर्चा में बीतता था।
  • फिर भी, घर में उनका बहुत सम्मान था। इसके दो मुख्य कारण थे:
    1. वे कभी झूठ नहीं बोलती थीं।
    2. वे एक की गोपनीय बात दूसरे पर ज़ाहिर नहीं करती थीं।
  • पिताजी घर के कार्यों और बच्चों की देखभाल में माँ की भूमिका भी निभा लेते थे।

लेखिका की परदादी

  • लेखिका की परदादी (दादी की सास) लीक से हटकर चलने वाली महिला थीं। वे अपरिग्रही (संग्रह न करने वाली) थीं।
  • जब लेखिका की माँ पहली बार गर्भवती हुईं, तो परदादी ने मंदिर जाकर मन्नत मांगी कि उनकी पतोहू की पहली संतान 'लड़की' हो। समाज में जहाँ सब लड़के की कामना करते थे, उनकी इस मन्नत ने सबको हैरान कर दिया। भगवान ने उनकी ऐसी सुनी कि घर में एक के बाद एक पाँच कन्याएँ पैदा हुईं।
  • चोर और परदादी का किस्सा: एक बार जब घर के पुरुष बारात में गए थे, एक चोर परदादी के कमरे में घुस आया। परदादी ने आहट सुनकर उसे पानी लाने भेजा। उन्होंने उसे हिदायत दी कि पानी कपड़े से छानकर लाना। जब चोर पानी लाया, तो उन्होंने आधा लोटा खुद पिया और बाकी आधा चोर को पिला दिया। उन्होंने कहा कि अब हम माँ-बेटे हो गए, चाहे तो चोरी कर या खेती। चोर ने चोरी छोड़ दी और खेती करने लगा।

लेखिका और उनकी बहनें

लेखिका (मृदुला गर्ग) सहित कुल पाँच बहनें और एक भाई थे। परदादी की मन्नत के असर से सभी बहनें हुईं और किसी ने भी हीन भावना महसूस नहीं की।

  • मंजुल भगत (रानी): सबसे बड़ी बहन। शादी के बाद लिखना शुरू किया और प्रसिद्ध लेखिका बनीं।
  • मृदुला गर्ग (उमा): दूसरी बहन (स्वयं लेखिका)। शादी के बाद लिखना शुरू किया। उन्होंने शादी के बाद अपना सरनेम नहीं बदला क्योंकि उनका मानना था कि नाम बदलने से व्यक्तित्व नहीं बदलता।
  • चित्रा (गौरी): तीसरी बहन। यह खुद नहीं लिखती थीं क्योंकि उनका मानना था कि घर में कोई पढ़ने वाला भी होना चाहिए। ये दबंग स्वभाव की थीं और अपनी शर्तों पर शादी की।
  • रेणु: चौथी बहन। यह जिद्दी और स्वभाव से अलग थीं। सामंतशाही विचारों की विरोधी थीं। एक बार स्कूल बंद होने पर भी भारी बारिश में पैदल स्कूल गईं और वापस आईं, सिर्फ अपने धुन की पक्की होने के कारण।
  • अचला: पांचवीं बहन। पत्रकारिता की पढ़ाई की और बाद में लेखिका बनीं।
  • राजीव: सबसे छोटे भाई, जो हिंदी में लेखन करते हैं।

लेखिका के सामाजिक कार्य और संघर्ष

  • डालमिया नगर (बिहार): शादी के बाद लेखिका बिहार के एक कस्बे में रहीं जहाँ औरतों और मर्दों का साथ में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। वहां उन्होंने हार नहीं मानी और शादीशुदा महिलाओं को गैर-मर्दों के साथ नाटकों में अभिनय करने के लिए तैयार किया। उन्होंने मिलकर कई नाटक किए और अकाल राहत कोष के लिए पैसा जमा किया।
  • बागलकोट (कर्नाटक): जब लेखिका कर्नाटक के छोटे कस्बे बागलकोट में थीं, तो वहां बच्चों के लिए कोई ढंग का स्कूल नहीं था। उन्होंने कैथोलिक बिशप से स्कूल खोलने की प्रार्थना की, लेकिन बिशप ने ईसाई जनसंख्या कम होने का हवाला देकर मना कर दिया।
  • लेखिका ने हार नहीं मानी और स्थानीय लोगों की मदद से एक ऐसा प्राइमरी स्कूल खोला जिसमें अंग्रेजी, हिंदी और कन्नड़ तीन भाषाएं पढ़ाई जाती थीं। उन्होंने उसे सरकार से मान्यता भी दिलवाई।

निष्कर्ष

इस पाठ में लेखिका ने दिखाया है कि कैसे उनके परिवार की औरतें (नानी, माँ, परदादी और बहनें) पारंपरिक बंधनों में रहते हुए भी अपने विचारों और कार्यों से पूरी तरह स्वतंत्र थीं। उन्होंने लीक से हटकर अपना जीवन जिया और यह साबित किया कि घर के भीतर रहकर भी अपनी मर्जी से जीवन जीना ही असली आजादी है। रेणु के बारिश में अकेले चलने के प्रसंग से लेखिका यह भी बताती हैं कि "अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और है," जो अपनी धुन में रहने के आनंद को दर्शाता है।

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