मेरे संग की औरतें - प्रश्न-अभ्यास
1. लेखिका ने अपनी नानी को कभी देखा भी नहीं फिर भी उनके व्यक्तित्व से वे क्यों प्रभावित थीं?
उत्तर:
लेखिका ने अपनी नानी को कभी नहीं देखा था क्योंकि उनकी मृत्यु लेखिका की माँ की शादी से पहले ही हो गई थी। फिर भी, लेखिका उनके व्यक्तित्व से निम्नलिखित कारणों से प्रभावित थीं:
1. स्वतंत्रता प्रेम: लेखिका की नानी भले ही पारंपरिक, अनपढ़ और परदानशीं महिला थीं, लेकिन उनके मन में देश की आज़ादी के लिए गहरा जुनून था। उन्होंने अपनी मृत्यु से पहले अपने पति (जो अंग्रेज़ों के भक्त थे) के बजाय एक स्वतंत्रता सेनानी (प्यारेलाल शर्मा) को बुलाकर अपनी बेटी की शादी किसी देशभक्त से करवाने का वचन लिया।
2. साहस और स्पष्टवादिता: वह जीवन भर परदे में रहीं, लेकिन अंतिम समय में उन्होंने किसी अजनबी पुरुष से बात करने की हिम्मत दिखाई और अपनी बात स्पष्ट रूप से रखी।
3. निजी जीवन में आज़ादी: उन्होंने कभी अपने पति की जीवनशैली में दखल नहीं दिया, लेकिन खुद भी अपने सिद्धांतों और विचारों पर अडिग रहीं। उन्होंने किसी के दबाव में न जीकर अपनी शर्तों पर जीवन जिया।
2. लेखिका की नानी की आज़ादी के आंदोलन में किस प्रकार की भागीदारी रही?
उत्तर:
लेखिका की नानी ने आज़ादी के आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से (जैसे धरने या जुलूस में) भाग नहीं लिया था, लेकिन उनकी भागीदारी अप्रत्यक्ष और बहुत महत्त्वपूर्ण थी:
1. उन्होंने अपने घर के 'साहबी' माहौल में भी अपने भीतर भारतीयता और आज़ादी के जज्बे को जीवित रखा।
2. जब उनकी मृत्यु निकट आई, तो उन्होंने अपनी 15 वर्षीय इकलौती बेटी (लेखिका की माँ) की शादी किसी अंग्रेज़-भक्त 'साहब' से करने के बजाय एक स्वतंत्रता सेनानी से करवाने का निर्णय लिया।
3. इस क्रांतिकारी कदम से उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनकी आने वाली पीढ़ी देशप्रेम के माहौल में पले-बढ़े। उनका यह कदम घर की चारदीवारी के भीतर से किया गया एक बड़ा विद्रोह और स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान था।
3. लेखिका की माँ परंपरा का निर्वाह न करते हुए भी सबके दिलों पर राज करती थी। इस कथन के आलोक में-
(क) लेखिका की माँ के व्यक्तित्व की विशेषताएँ लिखिए।
(ख) लेखिका की दादी के घर के माहौल का शब्द-चित्र अंकित कीजिए।
उत्तर (क):
लेखिका की माँ एक गैर-परंपरागत महिला थीं, फिर भी परिवार में उनका बहुत सम्मान था। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं:
* ईमानदारी और सत्यवादिता: वे कभी झूठ नहीं बोलती थीं। इस कारण घर के सभी लोग उनका आदर करते थे।
* गोपनीयता की रक्षा: वे एक की गोपनीय बात को दूसरे पर ज़ाहिर नहीं होने देती थीं। इस कारण उन्हें बाहरवालों से भी दोस्ती और विश्वास मिलता था।
* निष्पक्षता और निजत्व: वे निष्पक्ष थीं और घर के हर सदस्य की निजता (privacy) का सम्मान करती थीं।
* उदासीनता और सादगी: उन्हें गृहस्थी के कामों में रुचि नहीं थी। उनका समय किताबें पढ़ने, साहित्य-चर्चा और संगीत सुनने में बीतता था।
* मज़बूत व्यक्तित्व: वे शारीरिक रूप से कमज़ोर थीं, लेकिन मानसिक रूप से इतनी सशक्त थीं कि घर के अहम फैसलों में उनकी राय 'पत्थर की लकीर' मानी जाती थी।
उत्तर (ख):
लेखिका की दादी के घर का माहौल विरोधाभासों से भरा और काफी विचित्र था:
* विविध विचारधाराओं का संगम: घर में अलग-अलग विचारों के लोग एक साथ रहते थे। लेखिका के पिता और नाना अंग्रेज़ी तौर-तरीकों वाले थे, जबकि माँ सादा जीवन जीने वाली थीं और घर में गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव था।
* स्त्रियों को स्वतंत्रता: घर की औरतों को अपनी मर्जी से जीने की आज़ादी थी। कोई किसी के निजी जीवन या चिट्ठी-पत्री में ताक-झाँक नहीं करता था।
* लीक से हटकर चलना: घर की बुजुर्ग महिलाएँ (जैसे परदादी) परंपराओं को तोड़ने में यकीन रखती थीं। जहाँ समाज में लोग बेटों की कामना करते थे, वहीं परदादी ने पतोहू (बहू) के लिए पहली संतान 'लड़की' होने की मन्नत माँगी थी।
* कुल मिलाकर, घर का माहौल बौद्धिक, उदार और लोकतांत्रिक था जहाँ हर किसी को अपने ढंग से जीने की छूट थी।
4. आप अपनी कल्पना से लिखिए कि परदादी ने पतोहू के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की पैदा होने की मन्नत क्यों माँगी?
उत्तर:
परदादी ने पतोहू (लेखिका की माँ) के लिए पहले बच्चे के रूप में लड़की होने की मन्नत संभवतः निम्नलिखित कारणों से माँगी होगी:
1. लीक से हटकर चलने की आदत: पाठ में बताया गया है कि परदादी को "कतार से बाहर चलने का शौक" था। समाज में जहाँ हर कोई पहले बच्चे के रूप में बेटे की कामना करता था, उन्होंने जानबूझकर लड़की की मन्नत माँगकर रूढ़ियों को तोड़ने का प्रयास किया होगा।
2. महिलाओं के प्रति सम्मान: वे शायद यह साबित करना चाहती थीं कि लड़कियाँ किसी भी मामले में लड़कों से कम नहीं होतीं और परिवार का वंश लड़कियाँ भी आगे बढ़ा सकती हैं।
3. साहस और निडरता: वे अपनी अलग सोच को समाज के सामने रखना चाहती थीं और यह दिखाना चाहती थीं कि उन्हें समाज के तानों की परवाह नहीं है।
5. डराने-धमकाने, उपदेश देने या दबाव डालने की जगह सहजता से किसी को भी सही राह पर लाया जा सकता है-पाठ के आधार पर तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
यह कथन पूरी तरह सत्य है और पाठ में 'परदादी और चोर' के प्रसंग से यह सिद्ध होता है:
तर्क और उदाहरण:
एक बार हवेली में जब सब पुरुष बारात में गए थे, तो एक नामी चोर लेखिका की परदादी के कमरे में घुस आया। परदादी ने चोर को देखकर न तो शोर मचाया, न उसे डराया-धमकाया और न ही पुलिस को सौंपा। इसके बजाय, उन्होंने बहुत ही सहजता और मानवीयता से व्यवहार किया:
1. उन्होंने चोर से पानी माँगकर पिया और उसे भी पिलाया।
2. उन्होंने कहा, "एक लोटे से पानी पीकर हम माँ-बेटे हुए।" इस आत्मीयता ने चोर का हृदय परिवर्तन कर दिया।
3. अंत में, उन्होंने चोर के सामने विकल्प रखा- "अब बेटा, चाहे तो तू चोरी कर, चाहे खेती।"
परिणाम: परदादी के इस सहज प्रेम और विश्वास ने चोर को इतना प्रभावित किया कि उसने हमेशा के लिए चोरी का धंधा छोड़ दिया और खेती-बाड़ी करके एक भला इंसान बन गया। यदि परदादी ने उसे डराया या पुलिस के हवाले किया होता, तो शायद वह सुधरने के बजाय और बड़ा अपराधी बन जाता।
6. 'शिक्षा बच्चों का जन्मसिद्ध अधिकार है'- इस दिशा में लेखिका के प्रयासों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
लेखिका मृदुला गर्ग का मानना था कि अच्छी शिक्षा पाना हर बच्चे का अधिकार है। इस दिशा में उनके प्रयास निम्नलिखित हैं:
1. समस्या: शादी के बाद लेखिका कर्नाटक के छोटे से कस्बे 'बागलकोट' में रहीं। वहाँ उनके बच्चों और अन्य अफसरों के बच्चों के लिए कोई ढंग का स्कूल नहीं था।
2. प्रयास: लेखिका ने पास के कैथोलिक बिशप से अनुरोध किया कि वे वहाँ एक प्राइमरी स्कूल खोलें। जब बिशप ने क्रिश्चियन जनसंख्या कम होने का तर्क देकर मना कर दिया और शर्त रखी कि स्कूल 100 साल तक चलने का यकीन दिलाया जाए, तो लेखिका ने हार नहीं मानी।
3. संकल्प और सफलता: लेखिका ने खुद बीड़ा उठाया और अपने दम पर एक प्राइमरी स्कूल खोला। इसमें अंग्रेज़ी, हिंदी और कन्नड़ तीन भाषाएँ पढ़ाई जाती थीं। उन्होंने न केवल स्कूल चलाया बल्कि कर्नाटक सरकार से उसे मान्यता भी दिलवाई।
इस प्रकार, उन्होंने अपने जिद्दीपन और दृढ़ निश्चय से यह सुनिश्चित किया कि उस कस्बे के बच्चों को शिक्षा के लिए वंचित न रहना पड़े।
7. पाठ के आधार पर लिखिए कि जीवन में कैसे इंसानों को अधिक श्रद्धा भाव से देखा जाता है?
उत्तर:
पाठ में लेखिका की माँ के व्यक्तित्व के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जीवन में उन इंसानों को अधिक श्रद्धा भाव से देखा जाता है जो:
1. सत्यवादी हों: जो कभी झूठ नहीं बोलते और हमेशा सच का साथ देते हैं।
2. गोपनीयता रखने वाले हों: जो एक की गोपनीय बात को दूसरे के सामने ज़ाहिर नहीं करते। ऐसे लोग 'विश्वासपात्र' होते हैं।
3. निस्वार्थ और निष्पक्ष हों: जो दूसरों के मामलों में बेवजह दखल नहीं देते और न ही किसी का पक्ष लेते हैं।
4. सादा जीवन जीने वाले हों: जो दिखावे से दूर रहते हैं और अपने सिद्धांतों पर अडिग रहते हैं (जैसे लेखिका की माँ खादी पहनती थीं)।
ऐसे गुणों वाले व्यक्ति, भले ही वे सामाजिक परंपराओं का पालन न करें (जैसे लेखिका की माँ घर का काम नहीं करती थीं), फिर भी समाज और परिवार में सबका आदर और श्रद्धा प्राप्त करते हैं।
8. 'सच, अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और है'- इस कथन के आधार पर लेखिका की बहन एवं लेखिका के व्यक्तित्व के बारे में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
'सच, अकेलेपन का मज़ा ही कुछ और है'- यह कथन लेखिका और उनकी छोटी बहन 'रेणु' के स्वतंत्र और दृढ़ व्यक्तित्व को दर्शाता है।
1. लेखिका की बहन (रेणु) का व्यक्तित्व:
रेणु स्वभाव से बेहद जिद्दी और धुन की पक्की थीं। पाठ में वर्णित एक घटना के अनुसार, भारी बारिश के कारण जब पूरा शहर पानी से भरा था और यातायात ठप था, तब भी रेणु पैदल ही स्कूल चली गईं, जबकि सबने मना किया था कि स्कूल बंद होगा। वह दो मील पैदल चलकर स्कूल गईं और चौकीदार को देखकर वापस आईं। यह घटना दिखाती है कि वे अपनी मंजिल की ओर अकेले बढ़ने में रोमांच महसूस करती थीं और भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय अपनी धुन में रहना पसंद करती थीं।
2. लेखिका (मृदुला गर्ग) का व्यक्तित्व:
लेखिका का जीवन भी 'अकेलेपन' यानी अपनी अलग राह बनाने का उदाहरण है। उन्होंने डालमिया नगर और बागलकोट जैसे पिछड़े इलाकों में रहकर भी हार नहीं मानी। उन्होंने अकेले दम पर रूढ़ियों को तोड़ा—चाहे वह नाटकों में शादीशुदा औरतों को शामिल करना हो या बच्चों के लिए स्कूल खोलना हो।
निष्कर्ष:
दोनों बहनें यह मानती थीं कि अगर राह सही है, तो अकेले चलने में घबराना नहीं चाहिए। अकेलेपन में व्यक्ति को अपने विचारों को समझने और अपनी शर्तों पर जीवन जीने का जो आनंद मिलता है, वह भीड़ के पीछे चलने में नहीं है।