Q&A & Flashcards Available

Access questions, answers and flashcards for this chapter

View Q&A
Infographic
Quick Navigation:
| | |

इस जल प्रलय में

लेखक: फणीश्वरनाथ रेणु

1. लेखक का परिचय और बाढ़ का अनुभव

  • लेखक का गाँव ऐसे क्षेत्र में है जहाँ हर साल कोसी, पनार, महानंदा और गंगा की बाढ़ से पीड़ित लोग शरण लेते हैं।
  • लेखक तैरना नहीं जानते, लेकिन 10 साल की उम्र से ही वे 'बॉय स्काउट', स्वयंसेवक या रिलीफ वर्कर के रूप में बाढ़ पीड़ितों की मदद करते रहे हैं।
  • लेखक ने बाढ़ पर कई लेख और रिपोर्ताज लिखे हैं, लेकिन बाढ़ में घिरने और उसे भोगने का प्रत्यक्ष अनुभव उन्हें पहली बार 1967 में पटना में हुआ।

2. पटना में बाढ़ की आहट (1967)

  • लगातार 18 घंटे की बारिश के कारण पुनपुन नदी का पानी पटना के निचले इलाकों जैसे राजेंद्र नगर और कंकड़बाग में घुसने लगा।
  • शहर में जिज्ञासा का माहौल था। लोग रिक्शा, टमटम और पैदल पानी देखने जा रहे थे। सबकी जुबान पर एक ही सवाल था - "पानी कहाँ तक आ गया?"
  • लेखक और उनके मित्र कॉफी हाउस गए, जो बंद हो चुका था। उन्होंने देखा कि सड़क के किनारे गेरुआ झाग वाला पानी तेज़ी से सरकता आ रहा था, जिसे लेखक ने "मृत्यु का तरल दूत" कहा।

3. बाजार और लोगों की प्रतिक्रिया

  • गांधी मैदान में पानी भर रहा था और हजारों लोग वहां खड़े होकर यह दृश्य देख रहे थे।
  • शाम को रेडियो पर समाचार आया कि पानी आकाशवाणी के स्टूडियो की सीढ़ियों तक पहुँच चुका है, जिससे लोग थोड़े भयभीत हुए।
  • दुकानों में हड़बड़ी थी, नीचे का सामान ऊपर किया जा रहा था। खरीद-बिक्री बंद हो चुकी थी, लेकिन पान वालों की बिक्री अचानक बढ़ गई थी क्योंकि लोग वहां खड़े होकर बाढ़ की चर्चा कर रहे थे।
  • लेखक ने भी घर के लिए ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी और कंपोज की गोलियां जमा कर लीं।

4. सरकारी घोषणा और रात का माहौल

  • रात में जनसंपर्क विभाग की गाड़ी लाउडस्पीकर से घोषणा करती हुई निकली कि रात के 12 बजे तक पानी लोहानीपुर, कंकड़बाग और राजेंद्र नगर में घुस सकता है, इसलिए लोग सावधान हो जाएं।
  • देर रात तक पूरा शहर जागा हुआ था। पश्चिम की ओर से हलचल की आवाजें आ रही थीं।
  • लेखक को नींद नहीं आ रही थी, उन्होंने कुछ लिखने की सोची लेकिन फिर पुरानी यादों में खो गए।

5. बाढ़ की पुरानी यादें (स्मृतियाँ)

  • 1947 मनिहारी: लेखक को गुरुजी के साथ नाव पर दवा और केरोसिन लेकर बाढ़ पीड़ितों की मदद करने की याद आई। वहाँ "पकाही घाव" (पैरों में पानी से होने वाले घाव) की बहुत समस्या थी।
  • 1949 महानंदा: वापसी थाना के एक गाँव में बीमारों को नाव पर चढ़ाते समय एक बीमार युवक के साथ उसका कुत्ता भी नाव पर चढ़ गया। जब डॉक्टर ने कुत्ते को भगाने को कहा, तो युवक ने भी जाने से मना कर दिया। अंत में दोनों साथ गए।
  • मुसहरों की बस्ती में राहत बांटते समय लेखक ने देखा कि बाढ़ की त्रासदी के बावजूद वहां ढोलक-मंजीरा बज रहा था और लोग "बलवाही" नाच का आनंद ले रहे थे।

6. विडंबना और आधुनिकता

  • लेखक को 1967 का ही एक दृश्य याद आया जब कुछ सजे-धजे युवक-युवतियां एक नाव पर पिकनिक मनाने निकले थे। वे स्टोव पर कॉफी बना रहे थे और ट्रांजिस्टर पर गाना सुन रहे थे।
  • जब उनकी नाव गोलंबर के पास पहुंची, तो छतों पर खड़े लड़कों ने उन पर इतनी फब्तियां कसीं और सीटियां बजाईं कि उनका सारा "एक्जीबिशनिज्म" (प्रदर्शनवाद) तुरंत गायब हो गया।

7. पानी का आगमन

  • सुबह 5:30 बजे लोगों ने लेखक को जगाया। लेखक ने देखा कि पानी मोहल्ले में दस्तक दे चुका था।
  • चारों ओर शोर, कोलाहल और चीख-पुकार थी। पानी का कलरव सुनाई दे रहा था।
  • सामने की सड़क पर पानी की मोटी डोरी झाग और फेन के साथ तेजी से आ रही थी। बिजली के खंभे और ताड़ के पेड़ का तना धीरे-धीरे डूब रहा था।
  • लेखक ने देखा कि पानी बहुत तेजी से चढ़ रहा है। लेखक के घर के पास वाला पार्क (गोल पार्क) देखते ही देखते डूब गया और हरियाली गायब हो गई।

8. निष्कर्ष

  • बाढ़ का दृश्य देखकर लेखक को लगा कि काश उनके पास मूवी कैमरा या टेप रिकॉर्डर होता तो वे इस दृश्य को कैद कर लेते।
  • फिर उन्हें एहसास हुआ कि अच्छा है उनके पास कुछ नहीं है। कलम भी चोरी हो गई थी।
  • अंत में लेखक सोचते हैं कि यह अच्छा ही है कि वे केवल इस पल को जी रहे हैं और उनके पास इसे रिकॉर्ड करने या लिखने के लिए कुछ नहीं है।
Quick Navigation:
| | |
1 / 1
Quick Navigation:
| | |
Quick Navigation:
| | |