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सूखी डाली (उपेंद्रनाथ 'अश्क')
पाठ का परिचय
'सूखी डाली' उपेंद्रनाथ 'अश्क' द्वारा रचित एक पारिवारिक एकांकी है। यह एकांकी संयुक्त परिवार की महत्ता, परिवार में सामंजस्य, और नई व पुरानी पीढ़ियों के बीच के वैचारिक मतभेदों को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत करता है। एकांकी में परिवार की तुलना एक विशाल बरगद (वट) के पेड़ से की गई है, जिसके मुखिया दादा मूलराज हैं।
प्रमुख पात्र
- दादा मूलराज: परिवार के मुखिया, जो पूरे परिवार को एकता के सूत्र में बाँधकर रखना चाहते हैं।
- बेला (छोटी बहू): एक संपन्न और सुशिक्षित परिवार की बेटी, जो नई सोच रखती है।
- परेश: बेला का पति और दादा जी का पोता।
- अन्य पारिवारिक सदस्य: कर्मचंद, बड़ी बहू, मँझली बहू, छोटी भाभी, इंदु, रज़वा (नौकरानी) आदि।
पहला दृश्य: पारिवारिक मतभेद और छोटी बहू का असंतोष
- एकांकी की शुरुआत घर के बरामदे से होती है जहाँ घर की स्त्रियाँ एकत्र हैं। घर की पुरानी नौकरानी (रज़वा) रो रही है क्योंकि नई आई छोटी बहू (बेला) ने उसे काम से हटा दिया है।
- इंदु (छोटी बहू की ननद) और घर की अन्य बहुएँ (बड़ी बहू, मँझली बहू) बेला के व्यवहार से अत्यधिक नाराज़ हैं। बेला को लगता है कि घर के नौकर फूहड़ हैं और उन्हें काम करने का सलीका नहीं है।
- बेला एक सुशिक्षित और अमीर घराने से आई है। वह बात-बात पर अपने मायके की बड़ाई करती है और ससुराल के लोगों, रहन-सहन, और पुराने फर्नीचर को गँवारू और असभ्य मानती है।
- परेश (बेला का पति) बेला की आधुनिक सोच और परिवार की पुरानी परंपराओं के बीच फँस गया है। बेला की वजह से घर की अन्य महिलाएँ उसका (बेला का) मज़ाक उड़ाती हैं और पीठ पीछे उसकी निंदा करती हैं।
दूसरा दृश्य: दादा जी की सूझबूझ और कड़ा निर्देश
- दूसरे दृश्य में दादा जी हुक्का पी रहे हैं। उनका मानना है कि उनका परिवार एक महान वट वृक्ष की तरह है और वह किसी भी डाली (सदस्य) को टूटकर अलग नहीं होने देना चाहते।
- परेश दादा जी को बताता है कि बेला का मन इस घर में नहीं लगता। उसे लगता है कि सब उसकी आलोचना करते हैं और उसका अपमान करते हैं, इसलिए वह एक अलग मकान में रहना चाहती है।
- दादा जी परिवार के टूटने के डर से अलग मकान की माँग को सिरे से खारिज कर देते हैं। वह कहते हैं कि उनके जीते जी यह संभव नहीं है।
- समस्या का समाधान निकालने के लिए दादा जी घर के सभी सदस्यों (विशेषकर महिलाओं) को बुलाते हैं। वह आदेश देते हैं कि बेला एक बड़े घर की पढ़ी-लिखी बेटी है, इसलिए उसे इस घर में पूरा आदर-सत्कार मिलना चाहिए।
- दादा जी स्पष्ट निर्देश देते हैं कि कोई भी बेला से बहस नहीं करेगा, उसे कोई काम नहीं करने देगा, और उसकी हर बात मानकर उसे अत्यधिक सम्मान दिया जाएगा।
तीसरा दृश्य: बेला की घुटन और हृदय परिवर्तन
- दादा जी के आदेश के बाद परिवार के सभी सदस्य बेला से दूरी बना लेते हैं। वे उससे अत्यधिक विनम्रता से पेश आते हैं और उसे किसी भी घरेलू काम में हाथ नहीं लगाने देते।
- मँझली भाभी और अन्य स्त्रियाँ जानबूझकर उसके सामने 'जी-जी' करके बात करती हैं और उसे ऐसा महसूस कराती हैं जैसे वह उस घर की नहीं बल्कि कोई मेहमान या अजनबी हो।
- इस कृत्रिम सम्मान और अलगाव के कारण बेला को भारी घुटन होने लगती है। वह समझ जाती है कि यह सम्मान नहीं, बल्कि एक प्रकार का बहिष्कार है। उसका अकेलापन उसे रुला देता है।
- वह इंदु से इसका कारण पूछती है। इंदु उसे दादा जी के उस आदेश के बारे में बताती है जिसमें सबको उससे दूर रहने और केवल आदर करने को कहा गया था।
- यह सुनकर बेला का अहंकार टूट जाता है। उसे एहसास होता है कि परिवार में सच्चा सुख घुल-मिलकर रहने में है, न कि स्वयं को श्रेष्ठ मानकर अलग-थलग रहने में।
- बेला तुरंत कपड़े धोने के काम में इंदु की मदद करने पहुँच जाती है और उससे प्रार्थना करती है कि वह उसे बेगानों की तरह 'भाभी जी' न कहकर प्यार से केवल 'भाभी' कहे।
- जब दादा जी वहाँ आते हैं, तो बेला भावुक होकर उनसे कहती है कि "पेड़ से लगी डाली सूखकर मुरझा जाए, यह आपको पसंद नहीं होगा।" अर्थात् वह परिवार के पेड़ से जुड़कर, उसी में रहकर अपनापन पाना चाहती है, कृत्रिम सम्मान का बोझ उठाकर मुरझाना नहीं चाहती।
पाठ का संदेश
यह एकांकी यह स्पष्ट संदेश देता है कि संयुक्त परिवार में प्रेम, त्याग, और आपसी सामंजस्य ही सबसे महत्वपूर्ण है। अहंकार और स्वयं को श्रेष्ठ समझने की भावना परिवार को तोड़ती है। बड़ों का मार्गदर्शन और छोटों का समर्पण ही परिवार रूपी वट वृक्ष को हरा-भरा रख सकता है।
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