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बहू की विदा (विनोद रस्तोगी)
🎭 पात्र परिचय (Characters)
- जीवनलाल: एक धनी और लालची व्यापारी (उम्र 50 वर्ष)।
- राजेश्वरी: जीवनलाल की पत्नी, एक समझदार और ममतामयी महिला (उम्र 46 वर्ष)।
- रमेश: जीवनलाल का बेटा (उम्र 22 वर्ष)।
- कमला: रमेश की पत्नी अर्थात बहू (उम्र 19 वर्ष)।
- प्रमोद: कमला का भाई (उम्र 23 वर्ष)।
📖 एकांकी का विस्तृत सारांश (Section by Section)
1. प्रमोद का आगमन और जीवनलाल का इनकार
- एकांकी की शुरुआत में प्रमोद अपनी बहन कमला को विवाह के बाद पहले सावन में मायके ले जाने के लिए उसके ससुराल (जीवनलाल के घर) आता है।
- जीवनलाल बहुत ही कठोर स्वर में कमला की विदा करने से साफ़ मना कर देता है।
- प्रमोद विनती करता है कि हर लड़की का सपना होता है कि वह पहला सावन अपनी सखी-सहेलियों के साथ मायके में बिताए, लेकिन जीवनलाल पर इसका कोई असर नहीं होता।
2. दहेज का ताना और पैसों की माँग
- जीवनलाल अपनी नाराजगी का कारण बताता है कि प्रमोद के परिवार ने शादी में उन्हें उनकी हैसियत के बराबर दहेज नहीं दिया, जिससे उनकी बिरादरी में नाक कट गई है।
- प्रमोद कहता है कि उन्होंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार सब कुछ दिया, लेकिन जीवनलाल इसे अपना अपमान मानता है।
- जीवनलाल शर्त रखता है कि अगर प्रमोद अपनी बहन की विदा चाहता है, तो उसे इस 'अपमान के घाव' पर मरहम लगाने के लिए पाँच हज़ार रुपये नकद देने होंगे।
3. भाई-बहन (प्रमोद और कमला) की भावुक बातचीत
- निराश प्रमोद अपनी बहन कमला से मिलता है। कमला अपने भाई को देखकर रोने लगती है।
- प्रमोद बहन की खुशी के लिए अपना घर बेचकर पाँच हज़ार रुपये लाने का निर्णय लेता है।
- कमला एक आदर्श बहन और पत्नी होने का परिचय देती है। वह प्रमोद को घर बेचने से रोकती है और कहती है कि वह बिना विदा के ही ससुराल में रह लेगी। वह बताती है कि उसकी सास (राजेश्वरी) बहुत अच्छी हैं और उसे मायके की कमी महसूस नहीं होने देंगी।
4. राजेश्वरी का प्रवेश और उसका विरोध
- तभी जीवनलाल की पत्नी राजेश्वरी वहाँ आती है। वह अपने पति के लालची व्यवहार से भली-भांति परिचित है और उससे सख्त नफरत करती है।
- राजेश्वरी को जब पैसों की माँग के बारे में पता चलता है, तो वह पुरुषों की धन-लोलुपता पर व्यंग्य करती है कि वे इंसान से ज़्यादा पैसों से प्यार करते हैं।
- वह प्रमोद को अपनी तिजोरी की चाबियों का गुच्छा देती है और कहती है कि वह खुद पैसे निकालकर जीवनलाल को दे दे ताकि उसकी बहन की विदा हो सके। प्रमोद यह लेने से संकोच करता है।
5. कहानी में मोड़: रमेश की वापसी और गौरी की विदा का रुकना
- इसी दौरान जीवनलाल बाहर से आता है और अपनी बेटी गौरी की विदा की खुशी में मिठाई मँगाता है, क्योंकि उसका बेटा रमेश अपनी बहन (गौरी) को लेने उसके ससुराल गया हुआ था।
- लेकिन रमेश उदास और अकेले वापस लौटता है। वह बताता है कि गौरी की विदा नहीं हुई।
- रमेश कारण बताता है कि गौरी के ससुराल वालों का कहना है कि जीवनलाल ने दहेज पूरा नहीं दिया था, इसलिए उन्होंने गौरी को भेजने से मना कर दिया।
6. जीवनलाल का हृदय परिवर्तन और सुखद अंत
- यह सुनकर जीवनलाल गुस्से से भर जाता है और गौरी के ससुराल वालों को 'लोभी' और 'लालची' कहता है।
- राजेश्वरी तुरंत जीवनलाल को उसकी असलियत दिखाती है और कहती है कि "जो व्यवहार तुम अपनी बेटी के लिए दूसरों से चाहते हो, वही व्यवहार तुम दूसरों की बेटी (कमला) के साथ क्यों नहीं करते?"
- राजेश्वरी के इन शब्दों और अपनी ही बेटी के साथ हुए अन्याय से जीवनलाल की आँखें खुल जाती हैं। उसे अपनी गलती और दोहरे चरित्र का गहरा अहसास होता है।
- जीवनलाल प्रमोद से माफ़ी माँगता है और कहता है कि इस चोट ने मेरे सारे घावों का 'मरहम' कर दिया है।
- अंत में, जीवनलाल यह स्वीकार करता है कि "बेटी और बहू दोनों एक हैं" और वह ख़ुशी-ख़ुशी प्रमोद के साथ कमला की विदा कर देता है।
सीख (Moral): इस एकांकी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा हम अपने लिए चाहते हैं। दहेज प्रथा एक सामाजिक बुराई है, तथा बहू और बेटी में कभी भेदभाव नहीं करना चाहिए।
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