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महाभारत की एक साँझ (भारत भूषण अग्रवाल)
1. एकांकी का परिचय एवं पृष्ठभूमि
- लेखक एवं पात्र: यह एकांकी प्रसिद्ध साहित्यकार 'भारत भूषण अग्रवाल' द्वारा रचित है। इसके मुख्य पात्र धृतराष्ट्र, संजय, दुर्योधन, युधिष्ठिर और भीम हैं।
- कथानक का समय व स्थान: कहानी महाभारत युद्ध के अंतिम चरण (साँझ) की है। स्थान कुरुक्षेत्र के निकट 'द्वैत वन' का जलाशय (सरोवर) है।
- धृतराष्ट्र का शोक: एकांकी की शुरुआत धृतराष्ट्र की ठंडी साँस और पश्चाताप से होती है। वे युद्ध के भयंकर परिणामों पर शोक व्यक्त करते हैं और पुत्र-मोह को इस विनाश का कारण मानते हैं। संजय उन्हें सांत्वना देते हैं।
- दुर्योधन का छिपना: युद्ध में अपनी पूरी सेना नष्ट हो जाने के बाद, दुर्योधन आत्मरक्षा के लिए द्वैत वन के सरोवर (जल स्तंभ) में छिप जाता है।
2. पांडवों की ललकार और दुर्योधन का उत्तर
- सरोवर पर पांडवों का आगमन: युधिष्ठिर और भीम दुर्योधन को ढूँढ़ते हुए सरोवर तक पहुँच जाते हैं और उसे बाहर निकलने के लिए ललकारते हैं।
- भीम और युधिष्ठिर के व्यंग्य: भीम दुर्योधन को कायर कहता है जो अपने सहयोगियों की हत्या करवाकर पानी में छिपा है। युधिष्ठिर उसे उसके पापों (लाक्षागृह, द्रौपदी अपमान आदि) की याद दिलाते हैं।
- दुर्योधन का जवाब: दुर्योधन जल के भीतर से ही उत्तर देता है कि वह डरा नहीं है, बल्कि थककर विश्राम कर रहा है। उसके अस्त्र-शस्त्र और कवच नष्ट हो चुके हैं।
- दुर्योधन का प्रस्ताव: दुर्योधन युधिष्ठिर से कहता है कि अब उसे इस रक्तरंजित राज्य की कोई लालसा नहीं है। वह युधिष्ठिर को पूरा राज्य सौंपकर स्वयं वन में भगवद्भक्ति करना चाहता है।
3. युद्ध का निश्चय और अधर्म से प्रहार
- युधिष्ठिर का इनकार: युधिष्ठिर दुर्योधन की दया या दान में राज्य लेने से साफ मना कर देते हैं। वे दुर्योधन को कवच और अस्त्र देकर किसी एक पांडव से युद्ध करने की चुनौती देते हैं।
- गदा युद्ध: दुर्योधन इस चुनौती को स्वीकार करता है और गदा युद्ध के लिए भीम को चुनता है।
- भीम का छल: दोनों के बीच भयंकर युद्ध होता है। अंत में, श्रीकृष्ण के संकेत पर भीम युद्ध के नियमों को तोड़ते हुए (अधर्म से) दुर्योधन की जाँघ (जंघा) पर गदा का भीषण प्रहार करता है, जिससे दुर्योधन आहत होकर गिर पड़ता है।
- धृतराष्ट्र की पीड़ा: संजय अपनी दिव्य दृष्टि से यह सब धृतराष्ट्र को बताते हैं। अधर्म से पुत्र को पराजित होते देख धृतराष्ट्र अत्यंत व्यथित हो जाते हैं।
4. युधिष्ठिर और दुर्योधन का अंतिम संवाद
- युधिष्ठिर की सहानुभूति: युद्ध के बाद युधिष्ठिर मरणासन्न दुर्योधन के पास आते हैं। उनका विचार था कि दुर्योधन को अपने किए पर पश्चाताप हो रहा होगा और वे उसे शांति देने आए हैं।
- दुर्योधन का क्रोध: दुर्योधन युधिष्ठिर की सहानुभूति को ढोंग बताता है। वह मृत्यु के सामने भी अपना स्वाभिमान नहीं छोड़ता और युधिष्ठिर को 'धर्मराज' के बजाय 'मिथ्याभिमानी' कहता है।
- इतिहास का न्याय: युधिष्ठिर कहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ दुर्योधन को बुराई के प्रतीक के रूप में याद करेंगी। दुर्योधन पलटवार करते हुए कहता है कि इतिहास विजेता (युधिष्ठिर) लिखवाएंगे, इसलिए वे उसमें अपनी प्रशंसा और दुर्योधन की निंदा ही दर्ज करवाएंगे।
5. युद्ध के लिए दुर्योधन के तर्क (दुर्योधन का दृष्टिकोण)
- महत्वाकांक्षा का आरोप: दुर्योधन सारा दोष युधिष्ठिर पर मढ़ते हुए कहता है कि इस भीषण नरसंहार का असली कारण युधिष्ठिर की राज्य पाने की लालसा और महत्वाकांक्षा थी, न कि दुर्योधन का स्वार्थ।
- राज्य पर मूल अधिकार: दुर्योधन तर्क देता है कि चूँकि उसके पिता धृतराष्ट्र अंधे थे, केवल इसलिए राज्य की देखभाल पांडु को मिली थी। असल में राज्य पर धृतराष्ट्र और उनके बाद दुर्योधन का ही स्वाभाविक और जन्मसिद्ध अधिकार था।
- वनवास की सच्चाई: दुर्योधन के अनुसार, युधिष्ठिर ने वनवास के तेरह वर्षों का उपयोग शांति के लिए नहीं, बल्कि युद्ध की तैयारी (विराट, द्रुपद आदि से मैत्री और अस्त्र जुटाने) के लिए किया था।
- अभिमन्यु वध बनाम अन्य वध: जब युधिष्ठिर अभिमन्यु वध को अधर्म कहते हैं, तो दुर्योधन याद दिलाता है कि पांडवों ने भी भीष्म, द्रोण और कर्ण को छल और अधर्म से ही मारा है, यहाँ तक कि स्वयं दुर्योधन को भी अधर्म से गिराया गया।
6. एकांकी का अंत और दुर्योधन की मृत्यु
- दृढ़ निश्चय और अजेय गर्व: अपनी अंतिम साँसों तक दुर्योधन अपने तर्कों पर अडिग रहता है। वह स्पष्ट करता है कि उसने कोई पाप या षड्यंत्र नहीं किया, बल्कि केवल अपनी रक्षा और अधिकार के लिए युद्ध किया।
- वीरगति का संतोष: दुर्योधन को इस बात का संतोष है कि वह कायरों की तरह नहीं मरा, बल्कि एक शूरवीर की तरह लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो रहा है और स्वर्ग जाएगा।
- अंतिम पीड़ा (पिता का अंधापन): मृत्यु से ठीक पहले दुर्योधन के मुख से एक ही मार्मिक बात निकलती है कि उसके पिता (धृतराष्ट्र) अंधे क्यों हुए! यदि वे अंधे न होते, तो अधिकार का यह विवाद कभी उत्पन्न ही नहीं होता और न यह विनाशकारी महाभारत होता।
- निष्कर्ष: इस प्रकार यह एकांकी दुर्योधन को केवल एक खलनायक के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे स्वाभिमानी योद्धा के रूप में प्रस्तुत करता है जिसके अपने तर्क और अपना 'सच' है।
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