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मातृभूमि का मान (हरिकृष्ण 'प्रेमी')
पाठ और पात्रों का परिचय
- यह एकांकी प्रसिद्ध नाटककार श्री हरिकृष्ण 'प्रेमी' द्वारा रचित है, जिसमें देशभक्ति, वीरता, साहस और मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम को दर्शाया गया है।
- प्रमुख पात्र:
- राव हेमू: बूँदी के शासक (हाड़ा वंश)।
- महाराणा लाखा: मेवाड़ के शासक (सिसोदिया वंश)।
- अभयसिंह: मेवाड़ के सेनापति।
- वीर सिंह: मेवाड़ की सेना का एक सिपाही, जो मूल रूप से बूँदी का रहने वाला है।
- चारणी: एक देशभक्त गायिका जो राजपूतों में एकता चाहती है।
पहला दृश्य : मेवाड़ का प्रस्ताव और बूँदी का स्वाभिमान
- यह दृश्य बूँदीगढ़ में शुरू होता है जहाँ राव हेमू और मेवाड़ के सेनापति अभयसिंह के बीच बातचीत हो रही है।
- अभयसिंह प्रस्ताव रखते हैं कि विदेशी शक्तियों का सामना करने के लिए सभी राजपूतों को एक केंद्र (चित्तौड़) के अधीन हो जाना चाहिए, अर्थात बूँदी को मेवाड़ की गुलामी स्वीकार कर लेनी चाहिए।
- राव हेमू इस प्रस्ताव को स्पष्ट रूप से ठुकरा देते हैं। वे कहते हैं कि हाड़ा वंश कभी किसी की अधीनता या गुलामी स्वीकार नहीं करेगा।
- उनका मानना है कि राजपूत प्रेम के अनुशासन को मान सकते हैं, लेकिन शक्ति के बल पर किसी के अधीन नहीं हो सकते। बूँदी स्वतंत्र रहकर मेवाड़ का आदर कर सकता है।
दूसरा दृश्य : महाराणा लाखा की कठोर प्रतिज्ञा
- चित्तौड़ के राजमहल में महाराणा लाखा बहुत चिंतित और क्रोधित अवस्था में हैं क्योंकि उन्हें नीमरा के मैदान में बूँदी के राव हेमू से हारकर भागना पड़ा था।
- अपने आत्मसम्मान को पहुँची ठेस के कारण महाराणा लाखा एक भीषण प्रतिज्ञा करते हैं कि "जब तक वे बूँदी के दुर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे, तब तक अन्न-जल ग्रहण नहीं करेंगे।"
- सेनापति अभयसिंह उन्हें समझाते हैं कि बूँदी को जीतना इतना आसान नहीं है और इसमें बहुत समय लग सकता है।
- तभी चारणी वहाँ आती है और महाराणा को राजपूतों के बीच आपसी दुश्मनी न बढ़ाने की सलाह देती है।
- समस्या के समाधान के लिए चारणी सुझाव देती है कि चित्तौड़ में ही मिट्टी का एक नकली बूँदी दुर्ग बनाया जाए। महाराणा उसे नष्ट करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर लें, ताकि उनके प्राण भी बच जाएँ और राजपूतों का खून भी न बहे। महाराणा यह प्रस्ताव मान लेते हैं।
तीसरा दृश्य : वीर सिंह का मातृभूमि प्रेम
- चित्तौड़ के पास एक जंगली प्रदेश में बूँदी का हू-ब-हू नकली दुर्ग मिट्टी से बनाया जाता है। महाराणा और सेनापति इसका निरीक्षण करके चले जाते हैं।
- तभी मेवाड़ की सेना में काम करने वाला सिपाही वीर सिंह (जो कि हाड़ा राजपूत है और बूँदी का रहने वाला है) अपने साथियों के साथ वहाँ पहुँचता है।
- जब उसे पता चलता है कि महाराणा इस नकली बूँदी को नष्ट करके अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने वाले हैं, तो उसका खून खौल उठता है।
- वीर सिंह कहता है कि एक सच्चे हाड़ा राजपूत के लिए उसकी मातृभूमि का अपमान असहनीय है, चाहे वह असली दुर्ग हो या नकली। वह नकली बूँदी को भी प्राणों से अधिक प्रिय मानता है।
- वीर सिंह और उसके कुछ मुट्ठी भर साथी प्रतिज्ञा करते हैं कि वे अपनी जान दे देंगे, लेकिन इस नकली दुर्ग पर भी मेवाड़ का झंडा फहराने नहीं देंगे।
चौथा दृश्य : बलिदान, पश्चाताप और एकता
- शाम का समय है। महाराणा की सेना नकली दुर्ग पर हमला करती है, लेकिन उन्हें यह देखकर घोर आश्चर्य होता है कि अंदर से अचूक गोलियों और तीरों की बौछार हो रही है।
- वीर सिंह और उसके साथी प्राणों की परवाह किए बिना असली युद्ध कर रहे होते हैं। महाराणा लाखा भी वीर सिंह के इस अदम्य साहस और देशभक्ति को देखकर मन ही मन उसकी प्रशंसा करते हैं।
- युद्ध में एक भीषण धमाका होता है और वीर सिंह अपने साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हो जाता है। मेवाड़ का झंडा दुर्ग पर फहरा दिया जाता है।
- दुर्ग जीतने के बाद भी महाराणा लाखा को कोई खुशी नहीं होती। वे कहते हैं, "आज इस विजय में मेरी सबसे बड़ी पराजय हुई है।" उन्हें अपने झूठे अहंकार पर भारी पछतावा होता है जिसके कारण इतने निर्दोष और वीर प्राणों की बलि चढ़ गई।
- अंत में बूँदी के राव हेमू वहाँ आते हैं। महाराणा लाखा वीर सिंह के शव के पास बैठकर अपने अपराध की क्षमा माँगते हैं।
- राव हेमू कहते हैं कि वीर सिंह के बलिदान ने हम सभी राजपूतों को जन्मभूमि का सच्चा मान करना सिखाया है। इस बलिदान की आग ने मेवाड़ और बूँदी के दिलों को एक कर दिया है।
- पूरी राजपूत जाति वीर सिंह की अमर आत्मा के आगे अपना मस्तक झुकाती है, और इसी के साथ एकांकी समाप्त होता है।
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