Quick Navigation:
| | | |
संस्कार और भावना (विष्णु प्रभाकर)
1. एकांकीकार और पात्र परिचय
- ➔ लेखक: श्री विष्णु प्रभाकर (जन्म 1912)। इनकी रचनाओं में मानवतावादी दृष्टिकोण और मानवीय भावनाओं की गहराई देखने को मिलती है।
- ➔ माँ: एक पारंपरिक और संक्रांति काल की हिंदू नारी, जो अपने पुराने संस्कारों और ममता (भावना) के बीच उलझी है।
- ➔ अविनाश: माँ का बड़ा बेटा, जिसने एक दूसरी जाति (बंगाली) की लड़की से प्रेम विवाह किया है और परिवार से अलग रहता है।
- ➔ अतुल: माँ का छोटा बेटा, जो स्वभाव से शांत, व्यावहारिक और अपनी माँ व बड़े भाई दोनों से जुड़ा है।
- ➔ उमा: अतुल की पत्नी (माँ की छोटी बहू), जो समझदार है और कहानी में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करती है।
2. एकांकी की शुरुआत: माँ की पीड़ा और चिंता
- पर्दा उठने पर मध्यवर्गीय परिवार का दृश्य दिखता है, जहाँ उमा एक किताब पढ़ते हुए गहरी सोच में डूबी है।
- तभी माँ थकी और उदास अवस्था में प्रवेश करती हैं। उनके चेहरे पर गहरी पीड़ा है।
- माँ उमा को बताती हैं कि उन्हें नौकरानी (मिसरानी) से पता चला है कि उनका बड़ा बेटा 'अविनाश' पिछले महीने हैज़ा की भयंकर बीमारी का शिकार था और मरते-मरते बचा है।
- माँ इस बात से बेहद दुखी हैं कि उनके अपने बेटे की इतनी बड़ी बीमारी की खबर उन्हें किसी और से पता चली। वह फूट-फूटकर रोने लगती हैं।
3. संस्कारों और ममता (भावना) का द्वंद्व
- माँ रूढ़िवादी संस्कारों से बंधी हैं। अविनाश ने विजातीय (दूसरी जाति की) बंगाली लड़की से शादी की है, जिसके कारण माँ ने उसे घर से निकाल दिया था।
- हालाँकि, माँ का हृदय (ममता) अपने बेटे के लिए तड़पता है, लेकिन समाज और पुरानी परंपराओं (संस्कारों) की बेड़ियाँ उन्हें बेटे के पास जाने से रोकती हैं।
- माँ स्वीकार करती हैं कि उनके पति (अविनाश के पिता) भी बहुत कठोर और निर्मम थे, और कहीं न कहीं समाज के डर ने माँ को भी कठोर बना दिया है।
- माँ कहती हैं कि "संस्कारों की दासता (गुलामी) सबसे भयंकर शत्रु है," जो उन्हें अपने ही बेटे से दूर रखे हुए है।
4. उमा द्वारा भाभी (अविनाश की पत्नी) की सच्चाई बताना
- बातचीत के दौरान उमा माँ को एक रहस्य बताती है कि वह एक बार अविनाश की पत्नी (अपनी जेठानी) से मिलने गई थी।
- उमा उन्हें बहुत बुरा-भला कहने गई थी क्योंकि उसे लगता था कि उस बंगाली लड़की ने ही भाई को माँ से अलग किया है।
- किंतु जब उमा उनसे मिली, तो वह उनकी सुंदरता, शालीनता और भोलेपन को देखकर हैरान रह गई।
- अविनाश की पत्नी ने उमा से बड़ी मिठास से बात की और कहा कि वह खुद नहीं चाहती कि माँ और बेटे अलग हों, लेकिन वह अविनाश से बहुत प्रेम करती है। उसने ही अविनाश की बीमारी में दिन-रात एक करके उसकी जान बचाई थी।
5. अतुल का प्रवेश और नई दुखद खबर
- इसी बीच छोटा बेटा अतुल घर आता है। माँ उससे पूछती हैं कि क्या उसे अविनाश की बीमारी के बारे में पता था।
- अतुल शांति से स्वीकार करता है कि उसे न केवल पता था, बल्कि वह अपनी भाभी और भाई से मिलता भी रहता है।
- जब माँ और उमा उसे ताना मारते हैं कि वह पत्थर दिल है, तो अतुल एक बहुत ही दुखद समाचार देता है।
- अतुल बताता है कि अविनाश तो ठीक हो गया है, लेकिन उसकी सेवा करते-करते अब भाभी (अविनाश की पत्नी) बहुत गंभीर रूप से बीमार हो गई है और उसके बचने की कोई आशा नहीं है (वह मरणासन्न है)।
6. माँ का हृदय परिवर्तन और चरम उत्कर्ष (Climax)
- जैसे ही माँ सुनती हैं कि जिस बहू ने उनके बेटे की जान बचाई, आज वह खुद मौत के मुहाने पर खड़ी है, तो माँ का हृदय काँप उठता है।
- माँ का सारा झूठा सामाजिक अहंकार और पुरानी रूढ़ियाँ टूट जाती हैं। उनके अंदर की सच्ची 'भावना' और 'ममता' जाग उठती है।
- माँ जान जाती हैं कि यदि बहू को कुछ हो गया, तो उनका बेटा अविनाश भी यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाएगा।
- माँ तुरंत निर्णय लेती हैं कि वह अभी इसी वक्त अविनाश के घर जाएँगी और अपनी बीमार बहू को बचाएँगी।
7. निष्कर्ष एवं पाठ का मुख्य संदेश
अतुल माँ को चेतावनी देता है कि यदि वह वहाँ जा रही हैं, तो उन्हें उस नीची जाति की बहू को इस घर में पूरे सम्मान के साथ स्वीकार करना होगा। माँ बिना किसी हिचकिचाहट के इसे मान लेती हैं और नौकर को ताँगा (गाड़ी) लाने का आदेश देती हैं।
मुख्य संदेश:
अंत में उमा मुस्कुराते हुए अपने नाटक की वह पंक्ति दोहराती है कि "जिन बातों का हम प्राण देकर भी विरोध करने को तैयार रहते हैं, एक समय आता है जब हम उन्हीं बातों को चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं।" यह एकांकी यह सिद्ध करता है कि झूठे सामाजिक संस्कारों और रूढ़ियों के ऊपर हमेशा मानवीय भावना और सच्चा प्रेम विजयी होता है।
Quick Navigation:
| | | |
1 / 1
Quick Navigation:
| | | |